मैं अपने गाँव जाना चाहती हूँ

मैं अपने गाँव जाना चाहती हूँ। जाड़े की नरम धूप और वे छत

का सजीदा कोना,

नरम-नरम किस्से मूंगफली के दाने

और गुदगुदा बिछौना

मैं अपने गाँव जाना चाहती हूँ।

घूप के साथ खिसकती खटिया, किस्सों की चादर व सपनों की तकिया

मैं अपने गाँव जाना चाहती हूँ। दोस्तों की खुसफुसाहट हँसी के ठहाके,

यदा कदा अम्मा व जिज्जी के तमाशे मैं अपने गाँव जाना चाहती हूँ।

हाथों को बगलों में दबाए आँच पर चढ़ा चाय का भगोना

सब बातों में गुम है कोई फरक नहीं पड़ता किसी का होना न होना फिर भी भूल नहीं पाती

जाड़े की नरम घूप और छत का सजीला कोना मैं अपने गाँव जाना चाहती हूँ।

पुनःप्रकाशित : लेखिका की यह कविता पूर्व में स्मृति मंजूषा में वर्ष 2012 प्रकाशित हुआ था

 

सीमा “प्रियदर्शिनी”

5 thoughts on “मैं अपने गाँव जाना चाहती हूँ”
  1. अतिसुन्दर कविता गाँव की याद आ गई, बार-बार पढ़ने का मन करता है.

  2. बहुत अच्छी रचना गाँव की याद आ गई ऐसा लग रहा है कि फिर से गाँव की ओर चले चलें

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