अनंत काल स्तब्ध है, तटस्थ है, नीबद्ध है।
प्रकाश पुंज श्रृंखला शिशिर तले अखंड है।
श्वास की ही ताल पर, प्रचंड कोप बज्र है।
निर्माण प्राण स्वस्तिका अगम भी है सुगम भी है।

प्राण पुष्प वेदना कभी थामे कभी बढ़े।
विचित्र प्रेम पावनी त्याग पर अडिग भी है।
गीत में वो नज़्म है प्रवाह है खयाल है।
मेघ की गर्जना प्रफुल्ला मंद माद है।
युद्व की निनाद में वो रक्त पात थम गए।
दृश्य भी अदृश्य है स्तंभ भी निषिद्ध है।
मल्लिका रॉय(घोष) , लखनऊ
पुत्री प्रशांत कुमार घोष,मधेपुरा