फर्जी किसान आंदोलन- असली खेल तो अब शुरू हुआ है

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*फर्जी किसान आंदोलन- असली खेल तो अब शुरू हुआ है*

सबका काम करने का अपना तरीक़ा होता है. लोकतंत्र है तो विपक्ष रहेगा, विरोध रहेगा.

ध्यान दीजिए मोदी सरकार ने चिरोधियों को किस हालत में पहुँचा दिया – सीधा अटैक कभी नहीं किया, मोदी जी विरोधियों को हलाल करते हैं, धीमे धीमे.

वो तीस्ता जो कभी UPA सरकार में प्रधान मंत्री से नींचे बात ना करती थी, आज NGO के पैसे से दारू ख़रीद कर पीने को मोहताज हैं. वो NDTV जिससे UPA के मंत्री दब कर रहते थे आज चाँदनी चौक वाले हकीम के विज्ञापन दिखाता है. कितने ही पत्रकार youtuber बन गए. अभी हाल ही में राजदीप की भी यही नौबत आ गई. जिनके अंगड़ाई लेने से सत्ता के गलियारे सहम जाते थे, ढेरों ऐसे NGO / पत्रकार आप्रसंगिक हो गए.

देश के बड़े नेता ले लीजिए. राहुल को कांग्रेसी भी पप्पू मानने लगे हैं. अखिलेश को उन्हीं की पार्टी वाले मानने लगे हैं कि नालायक औलाद है. वो ममता बनर्जी जिन्हें कभी प्रधान मंत्री पद की सेकूलर उम्मीदवार माना जाता था, आज मुख्य मंत्री की कुर्सी बचाने के लिए दौड़ी घूम रही हैं. वो मायावती जिनके समर्थक उन्हें लौह महिला मानते थे, पक्ष में हों या विपक्ष में पहनती वह नोटों की माला ही थी, आज कार्यालय का चाय पानी का बंदोबस्त हो जाए इतने में ही टिकट बाँट रही हैं. लालू जेल में हैं. उत्तर भारत छोड़िए, दक्षिण भारत तक में बड़े बड़े नेता आप्रसंगिक होते जा रहे हैं. विपक्ष ने समय समय पर नेता खड़े कारने की कोशिश की. चाहे हार्दिक हों या अल्पेश या फिर कन्हैया कुमार सब एक सीट भर के नेता बन के रह गए.

370 हटाया, CAA लाए. सबको मालूम था बवाल होगा, हुआ. लेकिन अंतिम परिणाम यही रहा कि यह क़ानून इतिहास में दर्ज हो गए. विरोधियों के सारे बड़े नेता जेल में बंद हैं / केस लड़ रहे हैं, ज़िंदगी बीत जाएगी मुक़दमा लड़ते हुवे.

किसान आंदोलन चल रहा है. आंदोलन चलाना लोकतांत्रिक अधिकार है. लेकिन देखिए ढ़ाई महीने के अंदर ही इस आंदोलन का देश विरोधी चेहरा सबके सामने आ गया. मजबूरी में विपक्ष को अब फ़्रंट फूट पर आना पड़ रहा है, जो यह काम किसान नेताओं से करवाना चाह रहे थे. CBI / ATS की रेड पड़ रही हैं, सभी ऐसे नेताओं की फ़ायनैन्शल बैक बोन तबाह हो रही है. सब पर मुक़दमे लिखे जा रहे हैं. हिंदुस्तान में कहना आसान है, मुक़दमा लड़ लेंगे, इतनी ख़तरनाक धाराओं में कपिल सिब्बल जैसे वकीलों को दसियों लाख एक पेशी का देने में ये नेता बिक जाएँगे. इनमें तीन चौथाई देखिएगा एक साल के अंदर नेतागीरी छोड़ वाक़ई किसानी करने लगेंगे. अधिसंख्य पर ख़ौफ़ ज़ाहिर है, उन्हें मालूम है जब तक धरने में हैं तब तक तो कुछ नहीं लेकिन एक ना एक दिन वापस घर ही जाना है और सामना अदालत का करना है.

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ट्रस्ट नमो

राष्ट्रहित सर्वोपरि

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