कलवार संगठन एकता हेतु विचार: अशोक चौधरी प्रियदर्शी

सामाजिक संगठन की एकजुटता हेतु विचार: अशोक चौधरी प्रियदर्शी

 

जायसवाल/कलवार समाज का अस्तित्व प्राचीन काल से रहा है। सनातन धर्म के विभिन्न ग्रंथों में इसका उल्लेख प्राप्त होता है। अखंड भारत के विविध क्षेत्रों में यह समाज विभिन्न उपनामों, उपवर्गों एवं उपजातियों के रूप में विद्यमान रहा है। इस्लाम के उद्भव से पूर्व ही इस समाज के लोग मध्य एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक कृषि एवं व्यापार में पारंगत होकर समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहे थे।

ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, म्यांमार, श्रीलंका आदि क्षेत्रों में इस समाज की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही है। भारत के कई क्षेत्रों में इस समाज के शासकों ने कलचुरी, कालचुर्य, एडिगा, गौड़ आदि नामों से लगभग 1200 वर्षों तक शासन किया। इस समाज ने डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल, दीप नारायण सिंह, गोरख प्रसाद, डॉ. राजकुमार, के. कामराज, पांपना महाराज जैसी अद्वितीय विभूतियों को जन्म दिया।

कालांतर में कुछ सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के चलते इस समाज ने क्षत्रिय परंपरा को त्यागकर वैश्य समुदाय की ओर स्वयं को परिभाषित किया। अनेकानेक कारणों से समाज के कुछ वर्गों ने इस्लाम या ईसाई धर्म भी स्वीकार कर लिया — जैसे कि दक्षिण भारत (केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु) में ईसाई धर्म और पाकिस्तान आदि में इस्लाम की ओर झुकाव देखा गया।

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में समाज की एकता हेतु कई प्रयास हुए। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार आदि क्षेत्रों के शिक्षित, प्रभावशाली एवं सजग व्यक्तियों ने समाज को संगठित करने हेतु पहल की। कुछ प्रारंभिक संगठनों के गठन से समाज में एकता की भावना का उदय हुआ, किंतु समय के साथ क्षत्रिय-वैश्य विवाद ने समाज को पुनः विभाजित कर दिया।

वर्तमान में क्षेत्रीय, प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक सामाजिक संगठन अस्तित्व में हैं। दुर्भाग्यवश, मंच, माला, माइक एवं व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की प्रवृत्ति के कारण संगठन निर्माण की बाढ़ आ गई है। कुछ संगठन तो दिशा, दृष्टि और उद्देश्यहीन होकर केवल नाम के लिए कार्यरत हैं।
आज के परिप्रेक्ष्य में यह अपेक्षा करना कठिन है कि सभी संगठन अपने मतभेद एवं व्यक्तिगत हितों को त्यागकर एक में विलीन हो जाएँ। अतः यह आवश्यक है कि राष्ट्रीय / प्रांतीय स्तर पर कार्यरत प्रभावशाली संगठनों के वरिष्ठ और विचारशील प्रतिनिधिगण मिलकर “उच्चस्तरीय समन्वय समिति” का गठन करें और एक “कॉमन मिनिमम प्रोग्राम” तैयार करें, ताकि विभिन्न संगठनों को एक साझा दिशा और उद्देश्य मिल सके।

समाज की एकजुटता केवल तभी संभव है, जब संगठन अपने दायित्व को समझें और व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज की प्रगति, शिक्षा, राजनीति, सामाजिक सम्मान और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए कार्य करें।

🚩 संघे शक्ति कलौ युगे! 🚩

!! शब्द संयोजन !! दिनांक: १५ जून २०२५

©अशोक कुमार चौधरी “प्रियदर्शी”
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