*प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा से बेहतर कुछ नहीं*

✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी*

बोली और भाषा में सामान्य लोगों के लिए बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता है। बोली आम लोगों के अभिव्यक्ति का माध्यम है जबकि वही बोली व्याकरण से परिनिष्ठित होकर भाषा बन जाता है और विद्वानों द्वारा इसे लिपिबद्ध कर साहित्यिक रूप दे दिया जाता है। आम आदमी सरल भाषा अर्थात बोली के उपयोग पर जोड़ देता है जबकि विद्वान लोग अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप शुद्ध साहित्यिक भाषा के उपयोग पर जोड़ देते हैं। इसी अन्तर्द्वंद में वैदिक संस्कृत, लोकिक संस्कृत, प्राकृत, पालि, अपभ्रंश के अनेक रूप के पश्चात खड़ी बोली हिन्दी का जन्म होता है। भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान को इंगित करते हुए यह लोकोक्ति भी काफी सटीक है कि – तीन कोस पर बदले पानी, एक कोस पर बदले वाणी। फिर भी निर्विवाद रूप से आज भी भारत के बहुसंख्यक आबादी द्वारा हिन्दी समझा और बोला जाता है, इसलिए संविधान में भले इसे सिर्फ राजभाषा (ऑफिशयल लेंगवेज) का दर्जा प्राप्त हो लेकिन व्यवाहरिक रूप में हिन्दी ही हम भारतीयों की मातृभाषा है और इसे हर हाल में संवैधानिक रूप से भी मातृभाषा का दर्जा प्राप्त होना चाहिए। दुर्भाग्यवश हिंदुस्तान के जिस पढ़े लिखे समुदाय को अपनी मातृभाषा के हक हकुक की लड़ाई लड़नी चाहिए थी, वही लोग अपने को अति आधुनिक दिखाने और वर्षों से विदेशियों की गुलामी में रह कर उनके अनुकरण की गुलाम मानसिकता से ग्रसित होकर अंग्रेजी के ज्ञान को ही विद्वता की कसौटी मानने लगे हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजकल लोग भेड़चाल में अपने छोटे छोटे बच्चों के लिए भी अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खोजने लगे हैं और हद तो तब हो जाती है जब हिन्दी, उर्दू और संस्कृत की विशाल साहित्यिक संपदा से सम्पन्न राष्ट्र के नागरिक अपने बच्चों के मुहं से चंद अंग्रेजी के राइम्स सुन कर प्रफुल्लित हो जाते हैं। कुछ शिक्षक साथियों का तो यह भी कहना है कि शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान के कुछ प्रोफेसर और व्याख्याता प्रशिक्षु शिक्षकों को अंग्रेजी माध्यम में प्रशिक्षण देते हैं और हिन्दी माध्यम में प्रशिक्षण की मांग करने वाले शिक्षकों का मजाक उड़ाया जाता है। अब लाख टके का सवाल यह है कि क्या अंग्रेजी माध्यम में प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षक सुदूर ग्रामीण और देहाती इलाकों के सरकारी विद्यालयों में मौजूद गरीब बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने में सफल हो सकेंगे। इस परिस्थिति में कम्युनिकेशन गैप शिक्षकों और बच्चों के बीच एक लंबी खाई उत्पन्न कर देता है और ऐसी परिस्थिति में एक बेहतर शैक्षणिक माहौल का निर्माण महज कौड़ी कल्पना मात्र है।

मानव सभ्यता के विकास और उत्थान में विभिन्न स्रोतों से प्राप्त ज्ञान का अद्भुत योगदान रहा है। यही कारण है कि विद्वान लोग आधा पेट खा कर भी उचित ज्ञान के लिए शिक्षा प्राप्ति को अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानते हैं। कालांतर में शिक्षा के बाजारीकरण ने शिक्षा के ध्येय को बदल कर बेहतर रोजगार, अधिकाधिक धनार्जन और भौतिक संसाधनों तक आसानी से पहुंच के निमित्त सीमित कर दिया है। ऐसे में शिक्षा अपने मौलिक उद्देश्य बच्चों के नैसर्गिक प्रतिभा के विकास से विमुख होकर मानव को आधुनिकतम तकनीकी ज्ञान से परिपूर्ण रोबोट की तरह विकसित कर रहा है। यह किसी भी दृष्टिकोण से मानव सभ्यता और संस्कृति के लिए उचित नहीं है। राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रहित वंचित ज्ञान के बिना शिक्षित समाज राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में उपयोगी साबित नहीं हो सकते हैं। अपना देश और अपनी मिट्टी से लगाव के लिए प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता है। अपनी मातृभाषा पर बेहतर पकड़ अन्य भाषाओं में भी पकड़ बनाने में उपयोगी साबित होता है और यह समाज के सभी तबके के बच्चों को बेहतर शिक्षा एक समान वातावरण उपलब्ध कराने में सक्षम होता है। दुर्भाग्यवश जिन लोगों ने हीनभावना से ग्रसित होकर आजीवन अंग्रेजी माध्यम में अध्ययन किया, वही लोग यह ज्ञान बांटते हैं कि अंग्रेजी भाषा हिन्दी से बेहतर और समृद्ध भाषा है। हिन्दी पट्टी के हम शिक्षित समाज को इस गलत परंपरा का पुरजोर विरोध करना चाहिए अन्यथा अंग्रजों से आजादी के बाद भी हम लोग अंग्रेजी मानसिकता से ग्रस्त होकर कुंठित रह जायेंगे और यह हमारे गौरवशाली साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भी घातक साबित हो सकता है।

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