कल का पता न पल का पता है
भागा भागा फिरता है
जाती साँस आए न आए
फिर भी मैं मैं करता है ।

यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया कि सब से बड़ा आश्चर्य कया है । युधिष्ठिर ने जवाब दिया कि सब से बड़ा आश्चर्य यह है कि हर व्यक्ति यह जानता है कि जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं है , हर पल अनिश्चित है । जीवन कब समाप्त हो जाए , साँस किस पल रुक जाए कोई नहीं जानता फिर भी हम माया के जाल में उलझते जाते हैं । धन , संपत्ति , पद के पीछे भागते रहते हैं । अपने अहंकार में डूबे रहते हैं ।
कोटि धरती कोटि तारे कोटि सूर्य कोटि चंद्र
शून्य से भी शून्य हैं हम
अहंकार फिर भी प्रचंड ।

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राजीव जायसवाल, सी.ए. दिल्ली

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