क्यों मचा है नए कृषि कानून पर घमासान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने में 2016 में बरेली में कहा की 2022 तक देश के किसानो का दोगुना किया जायेगा ऐसा बोलते समय प्रधानमंत्री जी के मन में कोई योजना तो अवश्य रही होगी।

वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के अपने वादे को अमल में लाने के लिए केंद्र सरकार ने कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार की पहल की है। इसी क्रम में संसद से तीन नए कानून पारित हुए हैं। हालांकि, किसानों का एक वर्ग इनका विरोध भी कर रहा है। आइए, एक बार फिर जानते हैं कि इन कानूनों में क्या प्रावधान किए गए हैं और उनसे किसानों को क्या लाभ होंगे…

कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन व सरलीकरण) कानून-2020

प्रावधान: किसानों और व्यापारियों को राज्यों में स्थित कृषि उत्पाद बाजार समिति से बाहर भी उत्पादों की खरीद-बिक्री की छूट प्रदान की गई है। इसका उद्देश्य व्यापार व परिवहन लागत को कम करके किसानों के उत्पाद को अधिक मूल्य दिलवाना तथा ई-ट्रेडिंग के लिए सुविधाजनक तंत्र विकसित करना है।


आशंकाएं : किसान अगर सरकारी मंडियों के बाहर उत्पाद बेचेंगे तो राज्यों को राजस्व का नुकसान होगा। कमीशन एजेंट बेरोजगार हो जाएंगे। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) आधारित खरीद प्रणाली खत्म हो जाएगी। फसलों की सरकारी खरीद के साथ-साथ ई-ट्रेडिंग बंद हो जाएगी।

हकीकत: केंद्र सरकार तीनों कानूनों के मसौदे को संसद में पेश करते वक्त ही स्पष्ट कर चुकी है कि न तो मंडियां बंद होंगी, न ही एमएसपी प्रणाली खत्म होने जा रही है। इस कानून के जरिये पुरानी व्यवस्था के साथ-साथ किसानों को नए विकल्प उपलब्ध कराए जा रहे हैं। यह उनके लिए फायदेमंद है।

लाभ: किसानों के पास उत्पादों की बिक्री के लिए ज्यादा विकल्प उपलब्ध होंगे। बिचौलियों का रास्ता बंद हो जाएगा। प्रतिस्पर्धी डिजिटल व्यापार को बढ़ावा मिलेगा और किसानों को उत्पादों की बेहतर कीमत मिल पाएगी।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून-2020

प्रावधान : अनाज, दलहन, तिलहन, प्याज व आलू आदि को आवश्यक वस्तु की सूची से हटाना। युद्ध जैसी अपवाद स्थितियों को छोड़कर इन उत्पादों के संग्रह की सीमा तय नहीं की जाएगी।

आशंकाएं : असामान्य परिस्थितियों के लिए तय की गई कीमत की सीमा इतनी अधिक होगी कि उसे हासिल करना आम आदमी के वश में नहीं होगा। बड़ी कंपनियां आवश्यक वस्तुओं का भंडारण करेंगी। यानी कंपनियां किसानों पर शर्तें थोपेंगी, जिससे उत्पादकों को कम कीमत मिलेगी।

हकीकत : कोल्ड स्टोर व खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में निवेश बढ़ेगा, क्योंकि वे अपनी क्षमता के अनुरूप उत्पादों का भंडारण कर सकेंगे। इससे किसानों की फसल बर्बाद नहीं होगी। फसलों को लेकर किसानों की अनिश्चितता खत्म हो जाएगी। व्यापारी आलू व प्याज जैसी फसलों की भी ज्यादा खरीद करके उनका कोल्ड स्टोर में भंडारण कर सकेंगे। इससे फसलों की खरीद के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और किसानों को उनके उत्पादों की उचित कीमत मिल पाएगी।

लाभ: कृषि क्षेत्र में निजी व प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा। कोल्ड स्टोर व खद्यान्न आपूर्ति शृंखला के आधुनिकीकरण में निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। किसानों की फसल बर्बाद नहीं होगी और उन्हें समुचित कीमत मिलेगी। जब सब्जियों की कीमत दोगुनी हो जाएगी या खराब न होने वाले अनाज का मूल्य 50 फीसद बढ़ जाएगा तो सरकार भंडारण की सीमा तय कर देगी। इस प्रकार किसान व खरीदार दोनोेंं को फायदा होगा।

पहले की फसल खरीद प्रणाली

किसान राज्य सरकार की कृषि उत्पाद बाजार समितियों (एपीएमसी) यानी मंडियों में अपने उत्पाद बेचते थे।
मंडियों में किसान अपने उत्पाद अधिकृत कमीशन एजेंट के माध्यम से बेचने के लिए मजबूर होते थे। पंजाब व हरियाणा में उन्हें आढ़ती कहा जाता है। सिर्फ बिहार, केरल, मणिपुर, लक्षद्वीप, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तथा दमन एवं दीव में मंडियां नहीं हैं।
मंडियों में कमीशन एजेंट किसानों को उत्पाद बिक्री से मिलने वाली कुल रकम में से 1.5-3 फीसद की कटौती कर लेते हैं। यह कटौती उत्पाद की सफाई, छंटाई व अनाज का ठेका आदि के नाम पर होती है। मंडियां एजेंटों से फीस वसूलती हैं।
एफसीआइ समेत अन्य सरकारीएजेंसियां 60-90 दिनों तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के आधार पर किसानों से फसलों की खरीद करती हैं। हालांकि, इस दौरान फसलों की गुणवत्ता भी देखी जाती है। इसके बाद व्यापारी बाजार मूल्य के अनुरूप किसानों से फसलों की खरीद करते हैं।
कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून-2020

प्रावधान : किसानों को कृषि कारोबार करने वाली कंपनियों, प्रसंस्करण इकाइयों, थोक विक्रेताओं, निर्यातकों व संगठित खुदरा विक्रेताओं से सीधे जोड़ना। कृषि उत्पादों का पूर् में ही दाम तय करके कारोबारियों के साथ करार की सुविधा प्रदान करना। पांच हेक्टेयर से कम भूमि वाले सीमांत व छोटे किसानों को समूह व अनुबंधित कृषि का लाभ देना। देश के 86 फीसद किसानों के पास पांच हेक्टेयर से कम जमीन है।

क्यों मचा है नए कृषि कानून पर घमासान

किसानों ने बीते कुछ दिनों से दिल्‍ली से लगने वाली सीमाओं पर लगभग कब्‍जा जमाया हुआ है। इनमें पंजाब और हरियाणा के अधिकतर किसान हैं। हालांकि सरकार बार-बार नए कृषि कानून को लेकर किसानों की शंकाओं को दूर करने का प्रयास कर रही है।
कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि देशभर में न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था पहले की तरह जारी रहेगी और इसमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। 55 सालों में एक बार कांग्रेस ने किसानों का कर्जा माफ किया था, उसमें भी भारी घोटाला हुआ। जबकि मोदी सरकार ने किसान सम्मान निधि के तहत अब तक 92000 करोड़ से अधिक की राशि किसानों को दी है।

उन्होंने कहा कि कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक के पास होने से किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए नए-नए अवसर मिलेंगे। इससे उनका मुनाफा बढ़ेगा।
 
इससे कृषि क्षेत्र को जहां आधुनिक टेक्नोलाजी का लाभ मिलेगा, वहीं अन्नदाता सशक्त होंगे। न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद की व्यवस्था बनी रहेगी। ये विधेयक किसानों को अपने फसल के भंडारण और बिक्री की आजादी देंगे और बिचौलियों की चंगुल से उन्हें मुक्त करेंगे। 

आशंकाएं: अनुबंधित कृषि समझौते में किसानों का पक्ष कमजोर होगा। वे मोलभाव नहीं कर पाएंगे। प्रायोजक शायद छोटे व सीमांत किसानों की बड़ी संख्या को देखते हुए उनसे परहेज करें। बड़ी कंपनियां, निर्यातक, थोक विक्रेता व प्रसंस्करण इकाइयां किसी भी प्रकार के विवाद का लाभ उठाना चाहेंगी। कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा।

हकीकत: सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि इस कानून का लाभ देश के 86 फीसद किसानों को मिलेगा। किसान जब चाहें अनुबंध तोड़ सकते हैं, लेकिन कंपनियां अनुबंध तोड़ती हैं तो उन्हें जुर्माना अदा करना होगा। तय समय सीमा में विवादों का निपटारा होगा। खेत और फसल दोनों का मालिक हर स्थिति में किसान ही रहेगा।

लाभ: कृषि क्षेत्र में शोध व विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा मिलेगा।

अनुबंधित किसानों को सभी प्रकार के आधुनिक कृषि उपकरण मिल पाएंगे। उत्पाद बेचने के लिए मंडियों या व्यापारियों के चक्कर नहीं लगाने होंगे। खेत में ही उपज की गुणवत्ता जांच, ग्रेडिंग, बैगिंग व परिवहन जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी। किसान को नियमित और समय पर भुगतान मिल सकेगा।

पहले ऐसे होती थी अनुबंध कृषि

पहले अनुबंध कृषि का स्वरूप अलिखित था। तब निर्यात होने लायक आलू, गन्ना, कपास, चाय, कॉफी व फूलों के उत्पादन के लिए ही अनुबंध किया जाता था।
कुछ राज्यों ने पहले के कृषि कानून के तहत अनुबंध कृषि के लिए नियम बनाए थे।

आइए जानते हैं कि आखिर वो कौन से पहलू हैं, जिन्हें लेकर किसानों और व्यापारियों दोनों की चिंता बढ़ गई है. इन कानूनों को लेकर किस बात का डर है, जिसे सरकार अर्थव्यवस्था नायकों के दिमाग से निकाल नहीं पा रही है. या फिर किसानों-व्यापारियों का अपने भविष्य को लेकर आकलन ठीक है? दोनों पक्षों का क्या कहना है. मोदी सरकार के कृषि सुधार, कृषि अध्यादेश, आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955, न्यूनतम समर्थन मूल्य, किसान आंदोलन, मंडी समाचारकृषि कानून की वजह से क्या खत्म हो जाएंगी मंडियां?

मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा कानून

सरकारी दावे: इस कानून को सरकार ने कांट्रैक्ट फार्मिंग के मसले पर लागू किया है. इससे खेती का जोखिम कम होगा और किसानों की आय में सुधार होगा. समानता के आधार पर किसान प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम होगा. किसानों की आधुनिक तकनीक और बेहतर इनपुट्स तक पहुंच सुनिश्चित होगी. मतलब यह है कि इसके तहत कांट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाएगा. जिसमें बड़ी-बड़ी कंपनियां किसी खास उत्पाद के लिए किसान से कांट्रैक्ट करेंगी. उसका दाम पहले से तय हो जाएगा. इससे अच्छा दाम न मिलने की समस्या खत्म हो जाएगी.

किसानों का डर: अन्नदाताओं के लिए काम करने वाले संगठनों और कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून से किसान अपने ही खेत में सिर्फ मजदूर बनकर रह जाएगा. केंद्र सरकार पश्चिमी देशों के खेती का मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है. कांट्रैक्ट फार्मिंग में कंपनियां किसानों का शोषण करती हैं. उनके उत्पाद को खराब बताकर रिजेक्ट कर देती हैं. दूसरी ओर व्यापारियों को डर है कि जब बड़े मार्केट लीडर उपज खेतों से ही खरीद लेंगे तो आढ़तियों को कौन पूछेगा. मंडी में कौन जाएगा.

कृषि उपज वाणिज्य एवं व्यापार-संवर्धन एवं सुविधा कानून

सरकारी दावे: इस कानून के लागू हो जाने से किसानों के लिए एक सुगम और मुक्त माहौल तैयार हो सकेगा, जिसमें उन्हें अपनी सुविधा के हिसाब से कृषि उत्पाद खरीदने और बेचने की आजादी होगी. ‘एक देश, एक कृषि मार्केट’ बनेगा. कोई अपनी उपज कहीं भी बेच सकेगा. किसानों को अधिक विकल्प मिलेंगे, जिससे बाजार की लागत कम होगी और उन्हें अपने उपज की बेहतर कीमत मिल सकेगी.

इस कानून से पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति, कंपनी, सुपर मार्केट किसी भी किसान का माल किसी भी जगह पर खरीद सकते हैं. कृषि माल की बिक्री कृषि उपज मंडी समिति (APMC) में होने की शर्त हटा ली गई है. जो खरीद मंडी से बाहर होगी, उस पर किसी भी तरह का टैक्स नहीं लगेगा.

किसानों का डर: जब किसानों के उत्पाद की खरीद मंडी में नहीं होगी तो सरकार इस बात को रेगुलेट नहीं कर पाएगी कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मिल रहा है या नहीं. एमएसपी की गारंटी नहीं दी गई है. किसान अपनी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी मांग रहे हैं. वो इसे किसानों का कानूनी अधिकार बनवाना चाहते हैं, ताकि तय रेट से कम पर खरीद करने वाले जेल में डाले जा सकें. इस कानून से किसानों में एक बड़ा डर यह भी है कि किसान व कंपनी के बीच विवाद होने की स्थिति में कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता. एसडीएम और डीएम ही समाधान करेंगे जो राज्य सरकार के अधीन काम करते हैं. क्या वे सरकारी दबाव से मुक्त होकर काम कर सकते हैं?

व्यापारियों का कहना है कि सरकार के नए कानून में साफ लिखा है कि मंडी के अंदर फसल आने पर मार्केट फीस लगेगी और मंडी के बाहर अनाज बिकने पर मार्केट फीस नहीं लगेगी. ऐसे में मंडियां तो धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगी. कोई मंडी में माल क्यों खरीदेगा. उन्हें लगता है कि यह आर्डिनेंस वन नेशन टू मार्केट को बढ़ावा देगा.

एशेंसियल कमोडिटी एक्ट में संशोधन को मिली मंजूरी

सरकार का दावा: देश में ज्‍यादातर कृषि उत्पाद सरप्‍लस हैं, इसके बावजूद कोल्‍ड स्‍टोरेज और प्रोसेसिंग के अभाव में किसान अपनी उपज का उचित मूल्‍य पाने में असमर्थ रहे हैं. क्‍योंकि आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम की तलवार लटकती रहती थी. ऐसे में जब भी जल्दी खराब हो जाने वाली कृषि उपज की बंपर पैदावार होती है, तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता था.

इसलिए आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम में संशोधन करके अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दालें, प्याज और आलू आदि को इस एक्‍ट से बाहर किया गया है. इसके साथ ही व्यापारियों द्वारा इन कृषि उत्पादों की एक लिमिट से अधिक स्टोरेज पर लगी रोक हट गई है. जब सरकार को जरूरत महसूस होगी तो वो फिर से पुरानी व्यवस्था लागू कर देगी.

किसानों का डर: एक्ट में संशोधन बड़ी कंपनियों और बड़े व्यापारियों के हित में किया गया है. ये कंपनियां और सुपर मार्केट सस्ते दाम पर उपज खरीदकर अपने बड़े-बड़े गोदामों में उसका भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे.

क्यों बना था यह एक्ट

पहले व्यापारी किसानों से उनकी उपज को औने-पौने दाम में खरीदकर पहले उसका भंडारण कर लेते थे. बाद में उसकी कमी बताकर कालाबाजारी करते थे. उसे रोकने के लिए ही एसेंशियल कमोडिटी एक्ट बनाया गया था. जिसके तहत व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों के एक लिमिट से अधिक भंडारण पर रोक थी. 

ग्रामीण बैंक में 37 वर्षों के कार्यकाल में कृषि क्षेत्र में अपने अनुभवों के आधार पर मैं दावे से कह सकता हूं कि संसद से पारित तीनों कानूनों को लेकर भ्रम पैदा किया जा रहा है। ये विरोध प्रायोजितहैं। तीनों कानून क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले हैं। हालांकि, इससे उस वर्ग को खीझ हो सकती है, जिसने अब तक कृषि उत्पाद बाजार से कुछ ज्यादा ही कमाई की है।

लगभग सभी राजनीतिक दल देश में लागू पुराने किसान कानून में संशोधन चाहते रहे हैं, कुछ दलों ने तो लोकसभा में सशोधन प्रस्ताव का समर्थन भी किया, लेकिन लोकसभा से पारित होने के पश्चात कुछ दलों ने महसूस किया की इस प्रकार के कानून बनने से वर्तमान सरकार का हाथ मज़बूत होगा एवं उनका अस्तित्व ही खतरे में पर जायेगा इसलिए राज्यसभा में गैरहाजिर रहा तथा कुछ बड़ी पार्टी जो पहले इस ऐसा कानून चाहती थी उसका खुलकर विरोध किया।
दिल्ली सीमा के पास कृषि संशोधन कानून का विरोध करने वालों में किसान तो नहीं के बरावर हैं, लेकिन आढ़तिया, दलाल, कांग्रेसी, कम्युनिस्ट तथा चुनाव में जनता द्वारा अस्वीकृत नेता एवं स्वम्भू किसान नेता हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *