तब ससुराल में नयका पाहून


पहले के जमाने में दामाद की पूंछ परख और स्वागत का तरीका भी अलग ही ढंग का होता था।जब कभी, पूर्व सूचना पर आगमन होता तो क्या कहने।एक दो आदमी स्टेशन आते, एक सूटकेस थामता, पहले से तय किये रिक्शे में दामाद को बीचो बीच सैट कर, यात्रा का हालचाल पूंछते, रास्ते में कोई परेशानी तो नहीं हुई,सैकडों सवालों का जवाब देते दामाद जी का रिक्शा ससुराल की गली में खडा होता।अब लेने आये लोग बताते, बस जीजा जी थोडा सा पैदल चलना है।वो तीसरे घर के आगे अपनई बाला घर है।अगली बार आयेगे तो रोड बनी मिलेगी।
ससुराल गली का भी एक अलग ही रूआव होता है।दामाद जी उतरते ही पहले बालो में हाथ फैरते। कपड़ों की सिलबटो को खींच कर ठीक करते।आहिस्ता आहिस्ता ससुराल की तरफ कदम बढते।उनकी वी.आई.पी.सूटकेस थामे एक व्यक्ति दो कदम पीछे ही चलता।मोहल्ले की कुछ औरते और लडकिया दामाद दर्शन के लिए छत पर मौजूद होती।इन सबका ऐसा प्रभाव होता कि दामाद अपनी वास्तविक चाल ही भूल जाता।पत्नी की गली की सुगन्ध ही ऐसी होती है।दामाद जी उस बक्त अपने आप को राजेश खन्ना से कम ना मानते।चाल लचक मचक कर हो जाती।
लो जीजू आ गया घर, मार्गदर्शक बताता और हाथ से देहरी चढने का इशारा करता।पांव पखारा जाता, आगे का कमरा आज करीने से सजा होता।पलंग पर नई चादर होती ।स्टूल पर क्रोशिया से बने झक सफेद कवर होते।उस पर गुलदस्ता होता,और उसके पत्नी की एक फोटो,जिसमें बन्नो ठुड्डी पर हाथ रखे होती, अंदर से खुसुर पुसुर की आवाज आती, दिशा निर्देश दिया जाता, घर के छोटे बच्चे आते साफ सुथरे।सभी के बदन पर नये कपडे ही होते।रोज बहती नाक को आज उनकी अम्माओ ने गीले पेटीकोट से इतनी जोर से रगड कर साफ किया होता कि सबकी नाक लाल और सीधी दिखाई देती।सकुचाये से आकर पैर छूते।एक परिचय देता।ये तीनों गुड्डू के है ये चारों पप्पू के है,ये बुआ का है,ये छतरपुर बाली मौसी के है,ये पडौस के शर्मा जी का है,ये तीन चंपू,पुल्लू,बिल्लू पने बडे भैया के है।फिर आती रंग बिरंगी मुहल्ले की सालिया।जीजू नमस्ते, जीजू अभी तो रहोगे ना,जीजू कौन सी गाडी से आये।जीजू संकोच भरी मुस्कान के साथ सबका जवाब देता। कब जाओगे जीजू। जीजू बताते कल का रिजर्वेशन है, रिजर्वेशन शब्द पर जोर देकर जीजू बताता।छाती उस बक्त चौडी रहती।साली इसरार करती अभी रुकिए ना…हम टिकट फाड देगे आपका। कोई कहता जीजा शिल्पा टाकीज में शम्मीकपूर की पिक्चर,लगी है।तभी कोई सरहज आती और सबको डांटती चलो तुम लोग।अभी आये है, थके है आराम करने दो।फिर सरहज द्वारा आँचल को हाथ की ऊँगली में फंसा कर पैर छूआ जाता।अंदर खाने की तैयारी पर डिसकशन होता।ये मुन्ना कहाँ मर गया।आया बाबूजी।जाओ राधे हलवाई के यहाँ से गरम जलेबी, समोसा लेके आओ और हाँ आना पीछे के दरवाजे से।घर की औरते खाने की तैयारी में जुट जाती।दामाद नहाने जाता तो पहली बार चड्डी तौलिया देने उसकी पत्नी आती जो अभी तक सखियों के साथ ठिलिल खिलिल में लगी थी।तब जाकर दामाद अपनी पत्नी को देख पाताlतब पति धीरे से बोलता वो अटैची में आधा किलो लड्डू रखे है निकाल लो और अंदर दे देना।
लड्डू लाये हो,कुछ और ले आते अच्छी सी मिठाई मालूम तो है पहली बार आ रहे हो।आप ही दे देना निकाल कर।इतना कह कर वो चड्डी तौलिया रस्सी पर टांग कर रफूचक्कर हो जाती।दामाद नया कुर्ता पजामा पहन कर फिर ड्राइंग रूम की शोभा बढाने लगता।ये नया कुर्ता पजामा भी उसने खास आज दिन के लिये ही खरीदा होता था।खाना बन गया।आबाज आती, जमीन में बैठ के खात है कि टेबल कुरसी पे।पत्नी की आवाज दामाद सुनता, कहीं भी बैठ जाते है।उस दिन थाली विविध व्यंजनों वाली होती,चटनी भी जो सासू ने अपने होनहार दामाद के लिये अथक मेहनत से तैयार किया होता था।दामाद के कान अंदर की औेर होते, पत्नी की मीठी बोली सुनने को आतुर। तभी सासू किलकिलाती अरे का पसन्द है पूछे को भूल गयेlतब पत्नी की आवाज आती।नई अम्मा सब खा लेते है ये तो।जो भी बना दो।बस जब इनकी अम्मा आती है तो लडियाते है, अम्मा मोटी रोटी बना दो घी चुपर देना।
सास बड़बड़ाती यहीं सब के नखरे बहुत हैं।चलो ये अच्छी बात है, सीधे है कुछ भी खा लेते है… पूछ लो मोटी रोटी बनाये देते है।
अम्मा,जाओ तुम्ही पूंछ आओ।
तब सासू माँ आती-मोटी रोटी बना दें।दामाद मुंह में कौरा भरे हाथ मटका कर मना करता।तभी पत्नी दो पूरी और थाल में लाकर पटक देती।सरहज, साली मीठा खाने पर जोर देती।बस जीजू ये एक गुलाब जामुन और हमारी तरफ से।शाम को उनका सबसे व्यस्त साला आता।जो हम उम्र ही होता।ये वही दरियादिल साले साहव होते जो अपनी बहन के लिये ऐसा लडका चाहते थे जो सीधा साधा हो और खाता पीता ना हो।बोलता आओ जीजा घूम कर आते है।फिर अंदर हांक लगाता। अम्मा,जीजा को ले जा रहे है घुमाने।रात का खाना मत बनाना,वो सोहन है ना उसने निमन्त्रण किया है जीजा का, अम्मा बड़बड़ाती, गाडी फुर्र हो जाती।रास्ते में ही मुंडी घुमा कर पूंछता जीजा जी चलता है ना, दामाद सकुचाता, नहीं भाई।
अरे चलता है, जीजी बता रही थी।कभी कभार। गाडी सोहन के घर जा पहुचती। सोहन का आज इंतजाम फुल होता।सेब काजू तक होते।ना ना करते तीन चार पैग हो ही जाते।
फिर ढाबे में भोजन।अपनी बहन के लिये शराब ना पीने वाला पति ढूंढने वाला साला अब हम प्याला होता।
विदा होती तो टीका में बारी बारी से दो चार सौ रुपये भी हाथ लगते।जो रास्ते में पत्नी को आइसक्रीम खिलाने में निपट जाते।कोंईछा के बहाने एक बोरा चावल, पापड अचार अलग से समेट लाता।औरतें रोती, भरे गले से बात करतीं, स्टेशन चार छः लोग पहुचाने आते।जगह बनाते, बैठाते।ट्रेन चलने तक हाथ हिलाते।
अब कहाँ ऐसी ससुराल और आवाभगत। अब तो जाओ तो सालिया बोलती है जीजा नैट चल रहा है ना। प्लीज प्लीज जीजू जियो का रीचार्ज कर दो हमारे में।

One thought on “नयका पाहून”
  1. बहुत रोचक।
    आह वो भी क्या दिन थे जब पसीना ग़ुलाब था।

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