पश्चिम बंगाल की राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि मनोविज्ञान, प्रतीक, भावनात्मक उभार और बौद्धिक वर्चस्व की जटिल प्रयोगशाला है। यह वह प्रदेश है जहाँ राजनीति सड़क पर उतरकर कविता बन जाती है और कविता सत्ता की भाषा बोलने लगती है। इसी धरातल पर ममता बनर्जी ने अपनी राजनीति को गढ़ा—आंदोलनकारी मुद्रा, निरंतर संघर्ष, और हर परिस्थिति में स्वयं को पीड़िता तथा प्रतिरोध की प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने की कला। इस राजनीति में शोर है, दृश्य है, भावनात्मक उत्तेजना है—पर प्रश्न यह है कि क्या इसमें दीर्घकालिक नीति और स्थायी समाधान भी है?
यहीं से भारतीय जनता पार्टी के लिए असली चुनौती जन्म लेती है। चुनौती ममता बनर्जी से लड़ने की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति से जूझने की है जहाँ नौटंकी को नेतृत्व और शोर को साहस समझ लिया गया है। भाजपा यदि इसी शोर में अपनी आवाज़ मिलाएगी, तो वह भी उसी भीड़ का हिस्सा बन जाएगी। लेकिन यदि वह शोर के बीच नीति की स्पष्ट, ठोस और विश्वसनीय आवाज़ बन पाती है, तो बंगाल की राजनीति में एक वास्तविक विकल्प खड़ा हो सकता है।
ममता बनर्जी की राजनीति का सबसे मजबूत हथियार है—सड़क। सड़क पर उतरते ही वे प्रशासक नहीं, आंदोलनकारी बन जाती हैं। कैमरे, समर्थक, नारों की गूंज और भावनात्मक संवाद—यह सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचता है जिसमें तर्क पीछे और भावना आगे चलती है। यह राजनीति अल्पकालिक रूप से असरदार है, क्योंकि यह सीधे हृदय को छूती है। किंतु समय के साथ यही शैली थकान भी पैदा करती है। लगातार टकराव, हर मुद्दे पर संघर्ष और हर जांच को राजनीतिक प्रतिशोध बताने की प्रवृत्ति—मतदाता को अंततः यह सोचने पर मजबूर करती है कि शासन कहाँ है?
भाजपा की पहली और सबसे बड़ी भूल यह होगी कि वह इस सड़क-छाप राजनीति की नकल करे। नकल कभी मूल से अधिक प्रभावशाली नहीं होती। भाजपा को समझना होगा कि बंगाल का मतदाता केवल भावुक नहीं है, वह विवेकशील भी है। विशेषकर भद्रलोक—जिसे यहां भद्रोमानुष कहा जाता है—भावनाओं से बहता अवश्य है, पर निर्णय अंततः बुद्धि से लेता है। यह वर्ग शोर से नहीं, शालीनता से प्रभावित होता है; आरोप से नहीं, प्रमाण से; और नाटकीयता से नहीं, निरंतरता से।
ममता बनर्जी ने “दिल्ली बनाम बंगाल” का जो फ्रेम खड़ा किया है, वह उनकी राजनीति की रीढ़ है। हर केंद्रीय कार्रवाई, हर जांच, हर असहमति को वे बंगाल की अस्मिता पर हमला बताती हैं। यह रणनीति भावनात्मक रूप से शक्तिशाली है, पर बौद्धिक रूप से कमजोर। भाजपा को इसी कमजोरी को पहचानना होगा। उसे यह दिखाना होगा कि अस्मिता की रक्षा नारों से नहीं, संस्थाओं को मजबूत करने से होती है; और संघीय ढांचे की मजबूती टकराव से नहीं, सहयोग और सुशासन से आती है।
भद्रलोक को जीतने के लिए भाजपा को सबसे पहले अपनी भाषा बदलनी होगी। आक्रामकता, कटाक्ष और तंज—ये सब सोशल मीडिया पर तात्कालिक तालियाँ तो दिला सकते हैं, लेकिन बंगाल के बौद्धिक समाज को नहीं। यहां संवाद चाहिए, विमर्श चाहिए, और सबसे बढ़कर—सम्मान चाहिए। भाजपा को यह स्पष्ट करना होगा कि वह बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा को समझती है। रवींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और सुभाषचंद्र बोस को केवल चुनावी प्रतीक बनाकर नहीं, बल्कि शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक संस्थानों में निवेश के ज़रिए सम्मान देना होगा।
भद्रोमानुष का मस्तिष्क इस बात से भी चिंतित है कि राजनीति कहीं संस्थागत स्वतंत्रता को न निगल जाए। विश्वविद्यालय, मीडिया, साहित्य और कला—इन क्षेत्रों में स्वायत्तता का भरोसा देना भाजपा के लिए अनिवार्य है। यदि यह वर्ग यह महसूस करता है कि भाजपा सत्ता में आकर भी शालीनता और अकादमिक स्वतंत्रता बनाए रखेगी, तो उसका संदेह धीरे-धीरे भरोसे में बदल सकता है।
आम मतदाता का मनोविज्ञान इससे अलग है। वह बड़े वैचारिक विमर्श से अधिक अपने रोज़मर्रा के जीवन की परेशानियों से संचालित होता है। उसे सड़क पर भाषण नहीं, घर में सुविधा चाहिए। भाजपा को बंगाल में यह दिखाना होगा कि राजनीति जीवन को आसान बना सकती है। जूट उद्योग का पुनरुद्धार, चाय बागानों में श्रमिकों की स्थिति, मछलीपालन और तटीय अर्थव्यवस्था, लघु उद्योग और हस्तशिल्प—ये बंगाल की असली आर्थिक नसें हैं। इन पर ठोस नीति, स्पष्ट टाइमलाइन और ईमानदार क्रियान्वयन—यही सड़क की राजनीति का सबसे प्रभावी जवाब है।
महिला मतदाता बंगाल की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। ममता बनर्जी का महिला होना उन्हें स्वाभाविक भावनात्मक लाभ देता है। भाजपा को इस मोर्चे पर प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि विश्वसनीयता दिखानी होगी। महिला सुरक्षा केवल नारा नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था, फास्ट-ट्रैक न्याय, और सामाजिक निगरानी का प्रश्न है। जब महिलाएं यह महसूस करेंगी कि सुरक्षा भाषणों में नहीं, सड़कों पर दिख रही है, तब राजनीति का संतुलन बदल सकता है।
यहां नीतीश–नवीन–मंगल पांडे का संदर्भ भाजपा के लिए उपयोगी हो सकता है। नीतीश कुमार का मॉडल बताता है कि स्थिरता और निरंतरता से शासन चलता है, शोर से नहीं। नवीन पटनायक यह प्रमाणित करते हैं कि शालीन नेतृत्व और आपदा प्रबंधन से जनविश्वास जीता जा सकता है। मंगल पांडे संगठनात्मक अनुशासन और योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन का प्रतीक हैं। इन उदाहरणों के माध्यम से भाजपा यह संदेश दे सकती है कि वह टकराव नहीं, ट्रैक रिकॉर्ड की राजनीति करती है।
संचार रणनीति में भी आमूलचूल बदलाव जरूरी है। कम नारे, अधिक भरोसा—यह सूत्र भाजपा को आत्मसात करना होगा। बंगाल के अपने चेहरे, अपनी भाषा, अपनी संवेदना—यही संवाद का माध्यम बनना चाहिए। बाहरी नेतृत्व और आयातित भाषण यहां असर नहीं करते। डिजिटल मंचों पर भी शालीनता आवश्यक है। ट्रोलिंग से क्षणिक संतोष मिल सकता है, लेकिन दीर्घकालिक विश्वास नहीं।
संगठन के स्तर पर भाजपा को ‘सेवा से सत्ता’ का मार्ग अपनाना होगा। स्वास्थ्य शिविर, शिक्षा सहायता, आपदा राहत और स्थानीय समस्याओं में सक्रिय भूमिका—ये सब चुनावी रणनीति नहीं, सामाजिक दायित्व के रूप में दिखने चाहिए। सेवा की स्मृति लंबे समय तक मतदाता के मन में रहती है, जबकि भाषण की गूंज जल्दी खो जाती है।
ममता बनर्जी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत—भावनात्मक उभार—समय के साथ उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती