कल का पता न पल का पता है भागा भागा फिरता है जाती साँस आए न आए फिर भी मैं मैं करता है ।
यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया कि सब से बड़ा आश्चर्य कया है । युधिष्ठिर ने जवाब दिया कि सब से बड़ा आश्चर्य यह है कि हर व्यक्ति यह जानता है कि जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं है , हर पल अनिश्चित है । जीवन कब समाप्त हो जाए , साँस किस पल रुक जाए कोई नहीं जानता फिर भी हम माया के जाल में उलझते जाते हैं । धन , संपत्ति , पद के पीछे भागते रहते हैं । अपने अहंकार में डूबे रहते हैं । कोटि धरती कोटि तारे कोटि सूर्य कोटि चंद्र शून्य से भी शून्य हैं हम अहंकार फिर भी प्रचंड ।
मन को.छूने वाली रचना