The voice of New India
अमृत की वर्षा हुई
भीगे अंग प्रत्यंग
माधव जब लिपटा लिए
मोहे लगा कर अंग ।
राजीव जायसवाल, CA. DELHI

वह पल , वह वेला जब हम साक्षी भाव से भर गए , जिस पल हम ने परम सत्य से , परम प्रकाश से साक्षात्कारः कर लिया , जिस पल हम ने यह जान लिया कि हम शरीर नहीं हैं बल्कि शरीरों में रहते है , परम चैतन्य हैं । जिस पल हम ने यह जान लिया कि यह सब सोना जागना , जीना मरना तो शरीरों का है , हम तो न कभी सोते हैं न कभी सो कर जागते हैं कयों कि जागेगा तो वह जो कभी सोएगा । हम तो परमात्मा का अंश हैं ।
जिस पल हम यह जान जाते हैं कि हम दीन हीन निरीह अपराधी नहीं हैं बल्कि नित्य हैं , शाश्वत हैं , परम चैतन्य हैं और जिस पल हमारे भीतर आनंद के अमृत की वर्षा होती है व हमारे अंग अंग उस झरते अमृत से स्नान करते हैं , जिस पल हमारी मलिन चैतनयता परमात्मा की चैतनयता से मिलकर जागृत हो जाती है , शुद्ध हो जाती है , वे पल अमृत वेला के पल होते हैं ।