बातचीत कैसे करें ?

स्त्री-पुरुष का पारस्परिक वार्तालाप कैसे हो, किस विषय पर और कब हो, उन दोनों को अपने सम्बन्धियों से किस ढंग से वार्तालाप करना चाहिए. पड़ोसी से अथवा किसी अपरिचित, से किस प्रकार बातें करनी चाहिए यह विषय बहुत गम्भीर है। वार्तालाप की छोटी-सी भूल का परिणाम बड़ा भयंकर होता है । अतः इस ओर विशेष सावधान रहने की आवश्यकता है।

प्रायः दैनिक कार्यों-यथा भोजन कार्य वस्त्र तथा नौकरों या अन्य घरेलू बातों के अतिरिक्त रत्री-पुरुष एक दूसरे से ऐसी भर आशा रखते हैं कि किसी अवकाश या आराम के समय अन्य विषयों पर भी बातें करें, क्योंकि मनुष्य दिन की बाहरी थकावट मिटाना चाहता है और स्त्री घर में दिन-भर कार्य- भार से थककर शारीरिक और मानसिक आराम चाहती है। दोनों ही ऐसा मनोरंजन चाहते हैं जो उनकी थकानों को दूर करने में सहायक हो। अतः किसी-न-किसी बाहरी विषय पर वार्तालाप होना ही चाहिये । यदि अवकाश के समय स्त्री-पुरुष दोनों गुमसुम बैठे रहें तो न तो मन लगेगा और न कोई मनोरंजन ही होगा उलटा जी उकतायेगा और चिन्ताएं आ घेरेंगी।

ऐसी अवस्था में स्त्री-पुरुष में से किसी एक को मौन भंग करना ही होगा। अब विचारणीय विषय यह है कि वार्तालाप किस विषय पर आरम्भ किया जाय। इसके लिए वह वार्तालाप प्रारम्भ करती है तो उसे यह सोचना चाहिये कि उसका पति किन-किन विषयों में विशेष रुचि रखता है। जिसे जो विषय प्रिय हो उसी विषय पर वार्तालाप करना उचित है। इसके विरुद्ध यदि किसी पुरुष का दस्तकारी की ओर रुझान है और उससे धर्मिक विषयों पर बातें की जायें तो वह कभी भी उसमें दिलचस्पी न लेगा और कहने वाला समझेगा कि उसकी ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा और बहुत सम्भव है, वह यह भी समझ ले कि उसकी अवेहलना हो रही है। या अपने सामने सुनने वाले को बुद्धू समझ बैठे। यह बात पुरुष के लिए भी लागू होती है कि वह अपनी स्त्री की वार्तालाप सम्बन्धी रुचि का मनोयोग पूर्वक अध्ययन करे। यदि स्त्री अशिक्षित है और पुरुष शिक्षित तो स्त्री को पुरुष के रुचिकर विषय की जानकारी की उत्सुकता दिखाते हुए ऐसे प्रश्न करने चाहिए जिससे पुरुष उस विषय में वार्तालाप आरम्भ कर दे। बीच-बीच में कुछ-न-कुछ पूछ भी लेना चाहिये, जिससे वार्तालाप एक शुष्क भाषण ही न बन जाये और कहने वाले को भी यह अनुभव हो कि उसके कहे को ध्यानपूर्वक सुना जा रहा है। यदि स्त्री-पुरुष दोनों शिक्षित हैं और दोनों की रूचि मिन्न मिन्न है तो उन्हें एक दूसरे के विषयों की जानकारी की इच्छानुसार ही वार्तालाप प्रारम्भ कर देना चाहिये।

यदि स्त्री में इतनी योग्यता नहीं कि वह किसी गहन विषय पर वार्तालाप कर सके या उसे समझ सके तो पुरुष को प्रथम छोटी-छोटी बातों का शिक्षात्मक वर्णन प्रारम्भ करना चाहिए। इससे अपना मनोरंजन तो होगा ही स्त्री को भी नवीन-नवीन बातों के सुनने की उत्कण्ठा पैदा होगी और उसकी ज्ञान वृद्धि भी होगी।

जो पुरुष अपनी अशिक्षित स्त्री की अवहेलना करके केवल मतलब ही की बातों को छोड़कर किसी अन्य विषय पर बातें नहीं करता उसकी स्त्री की प्रायः यह शिकायत बनी ही रहती है कि “आप न अपनी कहते है और न दूसरे की ही सुनते है। इस चु्पी का दुष्परिणाम यहां तक होता है कि स्त्री को पुरुष के प्रेम में भी संदेह होने लगता है तथा वह अपने-आपको खोई-सी अनुभव करती है उसे कुछ अकेलापन-सा अनुभव होता है। वह कोई ऐसा साथी ढूंढने का यत्न करती है जो उससे बाते करे। दूसरों की बातों में उसे कुछ अपनत्व-सा प्रतीत होता है इस प्रकार स्त्री पुरुष से दूर हटती जाती है और पुरुष समझने लगता है कि उसकी स्त्री उससे दूर जा रही है।

स्त्रियों का प्रायः ऐसा स्वभाव होता है कि वे अपने प्रश्न का उत्तर कुछ विस्तार से सुनना चाहती हैं। अतः पुरुषों को स्त्रियों की इस स्वाभाविक मांग की अवहेलना नहीं करनी चाहिए और विशेषकर उन पुरुषों के लिए यह बहुत ही आवश्यक है जो अपनी शिक्षा के नशे में अधिक बोलना समय का दुरुपयोग और अनावश्यक कार्य समझते हैं। उन्हें यह भली-भांति समझ लेना है कि यदि उनकी स्त्री अशिक्षित है तो उनकी शिक्षा का लाभ उसे पहुंचना ही चाहिये यदि उसकी अवहेलना की गई तो निश्चिय ही गृहस्थ जीवन उजड्ड बन जायेगा।

स्त्री-पुरुष को वार्तालाप में व्यवहार कुशलता लानी चाहिये। तथा एक दूसरे के सम्बन्धियों के साथ सभ्यता और प्रेमपूर्वक वार्तालाप करने की आवश्यकता है। उन्हें अपनी बातचीत से यह अनुभव करना चाहिए कि वे उन्हें अपना समझते हैं। प्रायः यह देखा गया है कि भावावेश में मुंह से कुछ का कुछ निकल जाता है जिसका परिणाम स्त्री-पुरुष में मनमुटाव हो सकता है।

यदि कोई अपरिचित पतिदेव की अनुपस्थिति में घर पर आये तो उससे सभ्यतापूर्वक नाम, स्थान आदि पूछ ले और यदि सम्भव हो तो आने का कारण भी जानने का यत्न करे, ताकि पतिदेव के लौटने पर उन्हें पूरी सूचना दी जा सके। यदि सब बाते याद रह जाए तो ठीक है अन्यथा उन्हें कागज पर अंकित करके रखना चाहिए। केवल यह सूचना देना कि, “आपके पीछे एक आदमी आपसे मिलने आया था पर्याप्त नहीं है। यह तो पुरुष को अनावश्यक सोच विचार में डालना है। वैसे तो स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ही अपने पड़ोसियों से बातचीत करने के विषय में विशेष सावधानी की आवश्यकता है, फिर भी पुरुष की अपेक्षा स्त्री का एक विशेष कर्तव्य है, क्योंकि पुरुष की अपेक्षा स्त्रियां पडोस के अधिक सम्पर्क में रहती है। प्रायः स्त्रिया आपस में अपनी घरेलू और व्यक्तिगत बातों को भी परस्पर कह डालती है जिससे घर का पर्दा उघडता है और कभी-कभी अपना हलकापन प्रकट होता है या ऐसा भी देखा गया है कि अपनी वास्तविक स्थिति को छिपाकर बढ़ावे के साथ अपनी बात रखी जाती है। ये दोनों की अवस्थाएं निन्दनीय और हास्यप्रद है। स्त्री को केवल घर की साधारण बातों पर या बाहरी विषयों पर बातचीत करना उचित है। परस्पर वार्तालाप का विषय आर्थिक अवस्था, व्यय, घर की बुराई-भलाई अपने पुरुष या किसी आत्मीय की आलोचना या पति के कार्यों के सम्बन्ध में बातचीत भूलकर भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि यदि आपकी आर्थिक दशा अच्छी है तो उधार मांगने वाले तंग करेंगे और अगर आर्थिक दशा अच्छी नहीं तो भेद खुलने से लोग इज्जत न करेंगे और दूर रहने का यत्न करेंगे। घर की बुराइयों पर लोग उंगलियां उठाएंगे और भलाई पर ईर्ष्या करेंगे, अपने आत्मीय के प्रशंसात्मक गुणों से अनुचित लाभ उठाने का यत्न करेंगे यथा किसी कार्य के लिए सिफारिश आदि कराना। और यदि आत्मीय जन बदनाम है तो उससे आपका भी माप किया जावेगा।

पति के कार्यों के सम्बन्ध में बातचीत करने से कई बार उसके गुप्त भेद प्रकट हो जाते हैं, जिससे बड़ी हानि होती है। साथ ही यदि वे कार्य अच्छे हैं उनका वर्णन करने से शेखी मारना समझा जायेगा और कार्य अच्छा नहीं है तो पति को लोग घृणा की दृष्टि से देखेंगे या उसकी प्रतिष्ठा में बाधा पहुंचेगी।

इसका यह अर्थ नहीं है कि यदि ईश्वर ने आपको धन दिया है तो आप किसी की सहायता से हाथ खींचें या आप किसी की कोई भलाई कर सकती हों तो उसमें उदासीनता दिखायें। अभीष्ट यह है कि यथा सम्भव गुणों को क्रिया में लाने की आवश्यकता है, उसका प्रकाशन अनावश्यक है।

पड़ोसी से बातचीत करने में स्त्री-पुरुष दोनों के लिए यह भी आवश्यक है कि स्त्री का घनिष्ठ सम्बन्ध स्त्री के साथ और पुरुष का पुरुष के साथ ही रहे। इसका यह अर्थ नहीं कि स्त्री पड़ोस के पुरुषों से बोले ही नहीं। जहां तक पड़ोसी पुरुष के सत्कार या शिष्टाचार का प्रश्न है उसमें किसी प्रकार की कमी न हो, परन्तु वार्तालाप जितना कम हो उतना ही उचित है हास परिहास करना, या एकान्त में पड़ोसी पुरुषों से बातें करना स्त्री के प्रति संदेह का कारण बन जाता है चाहे यह मान लिया जाये कि पुरुषों की ओर से ऐसा बेहूदा प्रश्न न उठे परन्तु दुनिया को समझाना कठिन है।

<script type=”text/javascript” language=”javascript”>
var aax_size=’300×250′;
var aax_pubname = ‘thenamastebha-21’;
var aax_src=’302′;
</script>
<script type=”text/javascript” language=”javascript” src=”http://c.amazon-adsystem.com/aax2/assoc.js”></script>

गायत्री सिन्हा, कानपुर

2 thoughts on “स्त्री-पुरुष का पारस्परिक वार्तालाप कैसे हो”
  1. लाजवाब बहुत उपयोगी रचना व्यावहारिक अनुभव पर आधारित ऐसा प्रायः होता है. सीमा प्रणय, कानपुर

  2. लेख बहुत अच्छा है बार बार पढ़ने का मन करता है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *