एक जुराब की आत्मकथा
—————————————

 

मैं एक फटा हुआ जुराब, मोजा, या साक्स हूं।नित्य पैरों से रौंदा खाकर मेरी यह स्थिति है कि मैं
आज अच्छे समाज में नहीं जा
सकता। संभव है कि कुछ दिनों के बाद मैं कचरे के ढेर में चला जाऊं। फिर धूल मिट्टी में मिलकर
अपना अस्तित्व खो दूं। मेरे होने न होने का कोई जानने का प्रयास भी नहीं करेगा ।
जब मैं नया था तो अन्य चमकीले
साथियों की तरह दुकान में प्रर्दशन के लिए सजाकर रखा गया था। पास से गुजरने वाले की
नज़र जरूरत-बेजरूरत हम पर पडती थी और हमारी दृष्टि भी आने जाने वालों पर ।
मेरे ईर्द गिर्द लकड़ी के तख्ते के बने रैको में रंगीन साड़ी ‌ब्रा बनियान बेबी सूट्स समीप ही रहते थे। वहां मैं एक सामाजिक जीवन जी रहा था।
मेरे आनंद मय जीवन का संघर्षरत जीवन के रुप में परिवर्तन उस दिन हुआ । जिस दिन मालिक ने मेरे बदले कुछ
रुपये लेकर एक फौजी युवक को
मुझे सहर्ष सौंप दिया ।
उसके बाद से मुझे कभी राहत नहीं मिलती। यद्यपि उस के पास एक अन्य जुराब थी मगर मै ही दिन भर पैरों से रौंदा जाने लगा।
सुबह-दोपहर-शाम हमें विश्रांति नहीं।राहत नहीं।
मेरे आकर्षण , और सेवापराणता,
की भावना के बशीभूत होकर भी
कर्तव्यनिष्ठ फौजी जवान का मेरे प्रति निर्दयता पूर्ण ब्यवहार ने छ:
महिने से पूर्व ही मेरी हालत जर्र
जर्र कर दी।
तब मुझे कुछ आशा बंधी कि वह अब तो मुझे छोडेगा। मगर नहीं वह उस हाल में भी दो महिने और घसिट दिया।
हालांकि उसके संगी साथियों ने मुझसे सहानुभूति रखते हुए उस पर व्यक्तिगत रूप से व्यंग -कटाक्ष किया परन्तु वह
टाल गया। अब मुझे अपने फटेहालपन के साथ भी कुछ पल
के लिए तरश आने लगा। और कर ही क्या सकता था?
एक दिन उसके पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। शाम को पता चला कि वह एक महिना की छुट्टी में अपने पैतृक गांव जा रहा है। सरकारी फौजी गाड़ी में सवार होकर रेलवे स्टेशन गया।
उसे विदा करने उसके साथी स्टेशन तक आते थे। मैं उसके साथ था। उसके पैरों से सटकर
चमडे की तरह।
दो तीन दिन तक लगातार पैरों से रौंदा जाने के बाद मुझे उसके घर पहुंचकर विश्राम मिला।
लगातार दस दिनों तक मुझे कोई भी नहीं ‌छुआ।जूते में बैठे बैठे चमड़े की गंध लेता रहा।
अचानक एक रात में वहां से मुझे चुहा उठाया और अपने बिवर(बिल) में ले गया जहां ग्रीष्म के मौसम में शीतलता तो मिली मगर उसके दो चार तीक्ष्ण दन्त झेलने पड़े। हर्ष विषाद के मध्य
स्थिति में था कि मैं वहां से ढूंढ लिया गया । शायद कहीं जाने के
अवसर पर मेरी जरूरत पड़ी।
बिना जरूरत के किसी ने छुआ तक नहीं।
अब मैं साबुन लगा कर नहलाया गया। सूर्य के प्रकाश में
मेरा जर्र जर्र शरीर सुखाया गया।
सुखने के बाद रूमाल पर उड़ेलने के बाद रिक्त हुए सेंट की लघु शीशी मुझ पर भी डाला गया।
इस के बाद मैं उसके साथ
उसके ससुराल चला । वहां मेरी कम कद्र नहीं हुई। जब लघु विश्राम के लिए वह जूता बिना निकाले ही नाश्ता कर आराम कुर्सी पर लम्बा होकर लेट गया।
तब उसकी दो शरारती शालियों
द्वारा‌ अपने चतुर जीजा के होते में दोनों पैरों में महावर से रंगे जाते समय उन कोमल हाथों से मेरा जीर्ण कलेवर भी रंगीन हो गया।
बसन्त रितु के ठूठ तरूवर में भी उगनेवाले नव कोंपलों की तरह कुछ पल मेरा मन भी कसमसा कर रह गया।
फौजी जवान के पग के उंगलियों की रंगीनियां तो मिट गयी पर मेरे स्लेटी रंग पर चढ़ा
हरित रंग नहीं उतरा।असमय का
अति उत्साह प्रर्दशन चरित्र पर धब्बानुमा दिखता है जैसा कि
फौजी के ससुराल में रंगा‌गया मेरा
रंग।
चलो कोई बात नहीं। अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में कोई कामना नहीं है। अपने जीवन को
फौजी जवान को अर्पित कर देने
का आंतरिक संतोष है।
किसी फूल को गुनगुनाते सुना था कि—-
“मुझे तोड लेना वनमाली
देना उस पथ पर तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावे वीर अनेक।।”

पता नहीं माली ने उसकी सुनी
या नहीं परन्तु मैं तुच्छ उसी शीश चढ़ाने वाले मार्ग के पथिक पद
की सेवा कर सका। मौन समर्पण
कर सका। अपनी लघुता पर भी मुझे हर्ष है।।

______विजयकान्त द्विवेदी

मो० 8828186175
 9967424639

(पैतृक गांव: ममरखा पूर्वी चंपारण बिहार (पिन‌८४५४२५)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *