तू जिंदगी को जी,

उसे समझने की कोशिश न कर.

सुन्दर सपनो के ताने बाने बुन,

उसमे उलझने की कोशिश न कर.

चलते वक़्त के साथ तू भी चल,

अपने हाथो को फैला, खुल कर साँस ले,

अंदर ही अंदर घुटने की कोशिश न कर.

मन में चल रहे युद्ध को विराम दे,

खामख्वाह खुद से लड़ने की कोशिश न कर.

कुछ बाते भगवान् पर छोड़ दे,

सब कुछ खुद सुलझाने की कोशिश न कर.

जो मिल गया उसी में खुश रह,

जो सकून छीन ले वो पाने की कोशिश न कर.

रास्ते की सुंदरता का लुत्फ़ उठा,

मंजिल पर जल्दी पहुचने की कोशिश न कर.

अशोक प्रियदर्शी

One thought on “जीने की कला”
  1. जिंदगी कैसी है पहेली हाय।
    कभी ये हंसाए,कभी ये रुलाए।

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