मेरी चाहत

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 रमेश उपाध्याय वाराणसी


ऐ मुश्किलें ,अपनी चाहतें तो बता,
हर रोज यूँ मुझे परेशान न कर.
कोई इन्तहां तो होगी तेरी रुसवाई का,
मैं बेफिक्र चल रहा हूँ, तू खलल न डाल.
राहें कठिन है , उम्र भर का बोझ भी है,
मुझे मंजिल तक जाने की मुहलत तो दे

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2 thoughts on “मेरी चाहत”

  1. ऐ जिन्दगी गले लगा ले
    मैंने तो तेरे हर एक गम को
    गले से लगाया है
    है ना।

  2. तू बेवफा न होती तो मैं इतनी दूर क्यों होता,
    तू साथ भी होती तो इतना मजबूर क्यो होता,
    छोडो मेरे जख्मों पे अब नमक छिड़कना,
    जमाना तुम पर हँसेगा जब कहोगे गले लगा ले।

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