दानवीर भामाशाह का जीवन और त्याग: अशोक चौधरी “प्रियदर्शी”

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दानवीर भामाशाह का जन्म दिवस विशेष

दान की चर्चा होते ही भामाशाह का नाम स्वयं ही मुँह पर आ जाता है। देश रक्षा के लिए महाराणा प्रताप के चरणों में अपनी सब जमा पूँजी अर्पित करने वाले दानवीर भामाशाह का जन्म 29 जून, 1547 को अलवर (राजस्थान) में हुआ था।

भामाशाह के पिता श्री भारमल्ल और माता श्रीमती कर्पूरदेवी थीं। उनके पिता राणा साँगा के समय रणथम्भौर के किलेदार थे। भामाशाह ने अपने पिता की तरह राणा परिवार के लिए समर्पण किया था।

एक समय ऐसा आया जब अकबर से लड़ते हुए राणा प्रताप को अपनी मातृभूमि का त्याग करना पड़ा। वे अपने परिवार सहित जंगलों में रह रहे थे। राणा को बस एक ही चिन्ता थी कि किस प्रकार फिर से सेना जुटाएँ, जिससे अपने देश को मुगल आक्रमणकारियों के चंगुल से मुक्त करा सकें।

भामाशाह को जब राणा प्रताप के कष्टों का पता लगा, तो उनका मन भर आया। उन्होंने अपना और पुरखों का कमाया हुआ अपार धन राणा के चरणों में अर्पित कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार, उन्होंने 25 लाख रुपये और 20,000 अशर्फी राणा को दीं।

राणा ने आँखों में आँसू भरकर भामाशाह को गले से लगा लिया। राणा की पत्नी महारानी अजवान्दे ने भामाशाह को पत्र लिखकर इस सहयोग के लिए कृतज्ञता व्यक्त की।

भामाशाह ने कहा, “मैंने तो अपना कर्त्तव्य निभाया है। यह सब धन मैंने देश से ही कमाया है। यदि यह देश की रक्षा में लग जाये, तो यह मेरा और मेरे परिवार का अहोभाग्य ही होगा।”

भामाशाह के त्याग के कारण राणा प्रताप ने नयी शक्ति पायी और अपने क्षेत्र को मुक्त करा लिया। भामाशाह जीवन भर राणा की सेवा में लगे रहे और उनके देहान्त के बाद उनके पुत्र अमरसिंह के राजतिलक में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।

भामाशाह का जीवन हमें सिखाता है कि देश और समाज के लिए त्याग और समर्पण का महत्व क्या है।

हार्दिक श्रद्धांजलि,

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अशोक चौधरी “प्रियदर्शी”

कवि, लेखक, विचारक, चिंतक

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