
वैसे तो दुनिया में अनेक बीमारियाँ हैं चाहे वो सर्दी-जुकाम-बुखार हो, टीबी हो, कैंसर हो, एड्स या नवीनतम कोरोना वाइरस वाला ही क्यों न हो; उनका कुछ ना कुछ इलाज तो अवश्य है l लेकिन खास तौर पर राजनीति के क्षेत्र में “चिपकास” और “छपास” नामक दो बीमारियाँ ऐसी हैं जो लाइलाज हैं l चलिए उनकी चर्चा बारी-बारी से करते हैं :-चिपकास की बीमारी —
वैसे किसी भी पार्टी के स्वनामधन्य नेता जिन्हें न आम जनता से कोई खास मतलब है, न विचारधारा से और ना ही उस पार्टी विशेष के संगठन से, वे ही इस चिपकास की बीमारी से बुरी तरह ग्रसित पाये जाते हैं l
जब भी कोई बड़ा नेता या मंत्री जिला मुख्यालय में पधारते हैं तो ये चिपकू नेता एकाएक सक्रिय हो जाते हैं और वे सारी मर्यादाओं को तोड़ते हुए, सभी प्रोटोकॉल और पार्टी संगठन को धकियाते हुए माननीय मंत्रीजी के ऊपर ठीक उसी प्रकार टूट पड़ते हैं जिस प्रकार लहलहाती फसल के ऊपर टिड्डी दल टूट पड़ते हैं l ये महाशय लग्जरी गाड़ी की व्यवस्था कर मंत्रीजी के आगे-पीछे हो लेते हैं तथा सुरक्षा कर्मियों की हल्की-फुल्की फटकार सुनने के बावजूद वे फैविकोल अटूट बंधन से चिपके रहते हैं l मंच पर तो कुर्सी मिलने से रही लेकिन ये चिपकू नेता सबसे पिछली कतार में टाट की तरह खड़े अवश्य हो जाते हैं l कार्यक्रम से मंत्रीजी जैसे ही निकलते ये चिपकू नेता पलक झपकते ही पीछे लग जाते क्योंकि जरा-सा विलंब उनकी तारतम्यता को भंग कर सकता है l बेचारा पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता हसरत भरी नजरों से यह सब तमाशा देखता रह जाता है lइन चिपकास की बीमारी से ग्रसित स्वनामधन्य नेताओं की हालत मंत्रीजी के चले जाने के बाद ठीक वैसी ही प्रतीत होती है जैसे सुपर फास्ट सप्तक्रान्ति एक्सप्रेस ट्रेन की पूरी गति के साथ गुजरने पर रेलवे लाइन के अगल-बगल लावारिस उपजी बड़ी झाड़ियों की होती है जो ट्रेन के प्रचंड गति के साथ जोर-ज़ोर से हिलने-डुलने लगती हैं और धीरे-धीरे थोड़ी देर बाद शांत हो जाती हैं l छपास की बीमारी — वाकई, नेताजी अखबार में अपना नाम और फोटो छपा देख आत्ममुग्ध हो जाते हैं, लेकिन जिस दिन उन्हें कोई कवरेज नहीं मिल पाता तो समझिए उस दिन उनका कॉलर टाइट नहीं रह पाता है ।
कई बार वे रिपोर्टर और फोटोग्राफर से भी चिरौरी करते नजर आते हैं । जब कोई बैठक हो रही हो तो वे कोशिश करते हैं कि मंचासीन वक्ताओं के बीच में जगह मिल जाये अथवा मुख्य अतिथि की बगल में जगह बना ली जाये । कैमरा का फ़्लैश चमकने के एक सेकंड पहले अपना सिर उचका देते हैं, ताकि कैमरा का के फ्रेम में उनका महिमामंडित चेहरा भी आ जाये ।
मुझे देखकर बड़ी पीड़ा होती है, जब मिडियाकर्मियों की उपस्थिति में मुख्य नेता या वक्ता की बगल में सोफ़े पर विराजमान नेताजी को अपने से प्रभावशाली नेता के कारण वहाँ से विस्थापित होना पड़ता है । फिर भी वह हिम्मत नहीं हारता और सोफा की बगल किसी कुर्सी या स्टूल का इंतजाम तो कर ही लेता है ।
कभी – कभी कतिपय अति महत्वाकांक्षी नेता बैठको में विलंब से पहुँचते लेकिन मीडिया का कवरेज प्राप्त करने के लिए सभी सभासदों को लगभग कचारते हुए मुख्य नेता के बगल में जा खड़े हो जाते हैं । थोड़ी देर के लिए भारी व्यवधान नेताजी पर फ्लैश की चंचल किरणें पड़ती हैं और धीरे – धीरे सब कुछ हो जाता है सामान्य !
चिपकास और छपास के साथ साथ आजकल सेलफिस भी चल रहा है, 🤣
बिल्कुल सही