डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल : भारतीय इतिहास, विधि-व्यवस्था और संस्कृति के अमर शिल्पकार — भारत रत्न के सर्वोच्च दावेदार

शोध लेखक *© आचार्य अशोक कुमार चौधरी*

डॉ. कांशी प्रसाद जायसवाल (1881–1937) भारत के उन महान मनीषियों में अग्रगण्य हैं जिन्होंने भारतीय इतिहास, राजनीति, विधि, प्रशासन, अर्थव्यवस्था तथा सांस्कृतिक परंपराओं को वैज्ञानिक पद्धति से पुनर्स्थापित किया। उपनिवेशकाल के दौरान जब पश्चिमी विद्वान भारत को राजनीतिक रूप से पिछड़ा, अराजक और अविकसित राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे, तब डॉ. जायसवाल ने अभिलेख, सिक्कों, पुरालेखों और शास्त्रीय ग्रंथों के आधार पर यह सिद्ध किया कि भारत प्राचीन काल से ही उन्नत प्रशासन, शक्तिशाली राज्य, विकसित विधि-परंपरा और विश्व के प्रथम गणराज्यों की भूमि रहा है। उनका शोध न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि भारत की बौद्धिक आत्मा का वैज्ञानिक पुनर्जागरण भी है।
जन्म, शिक्षा और विद्वत्तापरक विकास
27 नवम्बर 1881 को उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में जन्मे डॉ. जायसवाल प्रारंभ से ही असाधारण प्रतिभावान थे। इलाहाबाद और कलकत्ता से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे उच्च अध्ययन के लिए ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय गए। संस्कृत, पालि, प्राकृत, अरबी, फारसी, चीनी, तिब्बती, यूनानी, लैटिन सहित 20 से अधिक भाषाओं में उनकी दक्षता ने उन्हें विश्व के उन चुनिंदा विद्वानों की श्रेणी में स्थापित किया जिनके शोध-निर्णय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य हुए। भाषा-ज्ञान, विश्लेषण-कौशल और स्रोत-पाठन में उनकी क्षमता अद्वितीय मानी जाती है।
संस्थान-निर्माण और शोध नेतृत्व
वे Bihar Research Society के संस्थापक विद्वानों में थे और पटना संग्रहालय की स्थापना, अभिलेखों के संरक्षण और पुरातत्व सामग्री के वैज्ञानिक वर्गीकरण में उनकी निर्णायक भूमिका रही। भारत के मुद्राशास्त्र (Numismatics) में जिस वैज्ञानिक दृष्टि का उपयोग आज मानक माना जाता है, उसका प्रारंभिक और सर्वाधिक प्रामाणिक प्रयोग डॉ. जायसवाल ने किया। उन्होंने सिक्कों को केवल मुद्रा नहीं, बल्कि राज्य-इतिहास, तिथि-निर्धारण और प्रशासनिक संरचना समझने का सबसे विश्वसनीय स्रोत माना।
मौलिक कृतियाँ और उनका महत्व
डॉ. जायसवाल की पुस्तक Hindu Polity (1924) भारतीय प्राचीन राजनीति, राजव्यवस्था और संविधान-परंपरा की सबसे प्रमाणिक व्याख्या है। इसमें उन्होंने सिद्ध किया कि भारत में—गणराज्य, सभा–समिति, मंत्रिपरिषद, न्यायालय, संहिताबद्ध विधि, अनुशासित प्रशासन और शक्तिशाली जन-राजनीतिक संस्थाएँ—सभी विद्यमान थीं। An Imperial History of India, Researches in the Numismatic History of Early India, Republics in Ancient India, Manu and His Times, Constitution of Ancient Indian States तथा उनके अनेक शोध-पत्र आज भी इतिहास-लेखन की बुनियादी सामग्री हैं। उन्होंने मौर्य, गुप्त, कश्मीर और कन्नौज साम्राज्यों की संरचना को वैज्ञानिक ढंग से पुनर्परिभाषित किया।
भारतीय राज्य, विधि और संस्कृति पर उनके विचार
डॉ. जायसवाल ने यह प्रतिपादित किया कि वैशाली, कपिलवस्तु, पिप्पलिवन और श्रावस्ती जैसे गणराज्य विश्व-लोकतंत्र के पहले संगठित मॉडल थे। उनकी स्थापना ने यह मिथक तोड़ा कि लोकतंत्र केवल पश्चिम का उपहार है। भारतीय विधि को उन्होंने संहिताबद्ध, तार्किक और न्यायप्रधान बताया। मनु, नारद, कात्यायन और कौटिल्य की नीतियों का उनके द्वारा किया गया विश्लेषण यह साबित करता है कि भारत की विधिक बुद्धि प्राचीन विश्व में श्रेष्ठतम थी। सांस्कृतिक दृष्टि से उन्होंने भारत की आत्मा को “निरंतरता और समन्वय की शक्ति” बताया।
समकालीन भारतीय और विदेशी विद्वानों का मूल्यांकन
इतिहासकार जदुनाथ सरकार के अनुसार “जायसवाल भारतीय इतिहास के वैज्ञानिक अध्ययन के प्रथम अग्रदूत थे।” राधाकमल मुखर्जी ने उन्हें भारतीय राज्य-व्यवस्था के आधुनिक विश्लेषण का आधार बताया। यूरोपीय विद्वान स्टैनली लेन-पूले ने लिखा कि “जायसवाल ने भारत को विश्व के शास्त्रीय इतिहास में पुनः प्रतिष्ठित किया।” कई विदेशी विश्वविद्यालयों ने उन्हें Honorary Fellowship प्रदान की।
जायसवाल/कलवार समाज पर उनका विश्लेषण
व्यापारिक समुदायों के इतिहास पर शोध करते हुए उन्होंने विशेष रूप से जायसवाल/कलवार समाज के आर्थिक-सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित किया। उनके अनुसार यह समाज प्राचीन भारत की—धातु-व्यवस्था, मुद्रा-ढलाई, कर-प्रणाली, नगर-प्रशासन, वित्तीय प्रबंधन और व्यापारिक अनुशासन—का प्रमुख स्तंभ रहा है। उन्होंने इसे भारत की आर्थिक संस्कृति की “रीढ़” का अंग बताया, जो आज भी समाज-चेतना के लिए प्रेरक है।
भारत रत्न की मांग : क्यों अनिवार्य और राष्ट्रीय अपेक्षा?
डॉ. के.पी. जायसवाल की शोध-यात्रा केवल एक विद्वान का कार्य नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता का वैज्ञानिक पुनर्निर्माण है। तथ्यतः—(1) उन्होंने सिद्ध किया कि विश्व-लोकतंत्र की जड़ें भारत में सर्वप्रथम विकसित हुईं। (2) उपनिवेशवादी विकृतियों को हटाकर भारत की वास्तविक राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान दुनिया के सामने स्थापित की। (3) भारतीय विधि और संविधान-परंपरा का वैज्ञानिक पुनर्पाठ किया। (4) भारत के प्रमाण-आधारित इतिहास-लेखन की आधुनिक नींव रखी। (5) Patna Museum और Bihar Research Society जैसी संस्थाओं को राष्ट्रीय बौद्धिक केंद्र बनाया। (6) भारतीय मुद्राशास्त्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित किया। ये सभी उपलब्धियाँ उन्हें भारत रत्न के योग्यतम विद्वानों की श्रेणी में रखती हैं। यह सम्मान केवल उनके नाम का गौरव नहीं बढ़ाएगा, बल्कि भारत की ऐतिहासिक चेतना, प्राचीन गौरव और वैज्ञानिक इतिहास-लेखन के प्रति राष्ट्र की प्रतिबद्धता को भी सुदृढ़ करेगा।
निधन और बौद्धिक विरासत
1 अगस्त 1937 को पटना में उनका निधन हुआ, परंतु उनका शोध-प्रकाश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना लगभग एक शताब्दी पूर्व था। विश्वविद्यालयों में उनके ग्रंथ पढ़ाए जाते हैं और इतिहास-लेखन का कोई गंभीर शोध उनसे विचलित नहीं हो सकता। वे भारतीय इतिहास के उन अमर स्तंभों में से हैं जिनकी विद्वत्ता समय के साथ और अधिक निर्मल और प्रभावशाली होती गई है।
निष्कर्ष
डॉ. कांशी प्रसाद जायसवाल वह महान विचारक हैं जिन्होंने भारत के बौद्धिक गौरव को प्रमाणों के सहारे पुनर्जीवित किया। उनके शोध ने सिद्ध किया कि भारत केवल आध्यात्मिक राष्ट्र नहीं, बल्कि गहन राजनीतिक, विधिक और सांस्कृतिक विकास का प्राचीन केंद्र भी है। ऐसे महामनीषी का सम्मान भारत रत्न जैसे सर्वोच्च नागरिक अलंकरण से होना समय की माँग ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के इतिहासबोध के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक भी है।

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लेखक परिचय :

*©आचार्य अशोक कुमार चौधरी*
शोध लेखक, इतिहास–समाजशास्त्र–ज्योतिष–हस्तरेखा एवं समसामयिक विषयों के लेखक, विचारक और सामाजिक चिंतक
सेवानिवृत्त वरिष्ठ बैंक अधिकारी
कटिहार, बिहार
संपर्क: 9431229143
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