
कोशी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक: भोगा यथार्थ {1}
हमारा प्रिय “कोशी बैंक “अब इतिहास बन गया है । 1 मई 2008 को उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक में विलय के बाद कोशी का नाम सदा के लिए विलुप्त हो गया ।लेकिन यह नाम हमारे मन में रचा बसा हुआ है ।कोशी की स्मृतियाँ आज भी जीवन्त हैं ।कोशी के वे साथी जो स्थापना के पांच/छह वर्षों बाद आये उन्हें तथा आज की पीढ़ी को यह जानना रोचक होगा कि उनके अग्रजों ने बैंक की पहचान बनाने के लिए क्षेत्र में कितना संघष॔ किया था व किस माहौल में काम करना पड़ा था। मैंने संक्षेप मे इसे बताने का प्रयास किया है ।
कोशी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना २३-१२-१९७६ को भठ्ठा बाज़ार स्थित एक भवन में हुई थी।इसका उद्घाटन बिहार सरकार के तत्कालिन कृषि मंत्री मो0 हुसैन आजाद द्वारा किया गया था। १९७८ में एन एच ३१ पर स्थानान्तरित होने से पहले प्रधान कार्यालय एवं पूर्णिया शाखा यहीं कार्यरत रही।बैंक के प्रथम अध्यक्ष आदरणीय श्री के एन शुक्ला थे ।बैंक में प्रथमतः शाखा प्रबंधक पद पर कम से कम तीन बर्षो के अनुभवी व्यक्तियों की बहाली हुई थी ।प्रथम बैच में निम्न सात का चयन हुआ था:- स्व फैजल अहमद खान स्व० हराधन रजक स्व० त्रिवेणी कान्त मिश्रा स्व० हंस कुमार पासवान स्व० रवीन्द्र कुमार सिंह श्री महेश प्रसाद साह श्री रमेश उपाध्याय.
९-५-१९७७ का दिन मेरे लिए एवं बैंक के अभिलेख में सदा ही यादगार दिन रहेगा । इसी दिन किसी भी कैडर में योगदान देने वाला मैं प्रथम व्यक्ति बना ।इस बात का मुझे सदा ही फक्र रहा और इसी भावना से यथाशक्ति बैंक को देने का प्रयास किया । उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक में “कोशी”के विलय का भी मै भागीदार बना । जब पूर्णिया प्रधान कार्यालय क्षेत्रीय कार्यालय बना उस समय मैं ही क्षेत्रीय प्रबन्धक हुआ ।विलय प्रक्रिया पूरी करने में उस समय के साथियों ने कठिन परिश्रम कर मेरा साथ दिया था।
मेरे योगदान के दिन भठ्ठा बाज़ार स्थित प्रधान कार्यालय में तत्कालिन अध्यक्ष श्री के एन शुक्ला के अलावा प्रवर्तक बैंक के श्री राम उदार राय ,सुश्री सुनीता सिन्हा ,स्व० उमेश प्रसाद एवं श्री वृज कुमार भगत अस्थायी रूप में कार्यकर्त थे ।इसी भवन में बगल के कमरा में पूर्णिया शाखा कार्यरत थी जिसमे सेन्ट्रल बैंक के कोई पदाधिकारी व श्री रंगनाथ मिश्रा कार्य कर रहे थे । उस समय तक तीन अन्य शाखाये भी खुल चुकी थी । शाखायें खोलने हेतु भवन खोजे जा रहे थे ।कार्यक्षेत्र में भवन की उस समय बड़ी दयनीय स्थिति थी। वहाँ के निवासी साथियों को तो अनुभव है लेकिन नयी पीढ़ी को अब इस पर शायद ही विश्वास हो । एक दिन अध्यक्ष महोदय के साथ मैं टेढ़ागाछ गया था। प्रखंड का भवन काम चलाऊ था । प्र0 वि0 पदाधिकारी आम के पेड़ के नीचे टेबुल कुर्सी लगाकर बैठे थे ,हम भी बैठे ।वे भवन की समस्या बता रहे थे और एक बड़ा कमरा देने की बात कर रहे थे, तभी एक बड़ा आम उनके सिर पर धम्म से गिरा ।वे माथा सहला रहे थे और हम एक दुसरे को देख रहे थे । सुबह कार्यालय में शुक्ला साहब ने मुझसे हँसते हुए कहा कि आप हमेशा पटना,बनारस में रहे हैं , एलास्टिक ,प्लास्टिक व लिपस्टिक देखे हैं,ऐसे हलात में कैसे रह पाईयेगा । उम्र में वे काफी बड़े थे तथा व्यवहार भी पितृवत था । उन्होंने कहा कि कल गाड़ी से राय साहब के साथ कुमारखण्ड जाकर भवन देख आइये । खैर, सुबह हम कुमारखण्ड के लिए निकले ।रास्ते में सुरम्य हरे भरे बृक्ष,शान्त व मनोरम मौसम को देखकर मन प्रसन्न हुआ ।जैसे 2 आगे बढ़ते गए नंगे बच्चे ,एक कपडे में तन ढकने का असफल प्रयास करती महिलायें और झोपड़ियों की कतार देख आंखें भर आयीं ।इतनी गरीबी तो प्रो0 एम एल दांतवाला की Poverty in India नामक एक अध्ययन के क्रम में पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी नहीं देखी थी ।मुझे भावुक देखकर साथियों ने कहा कि दार्शनिक नहीं बनें ,यह यहाँ का यथार्थ है । बनमंखी,जानकीनगर व मुरलीगंज होते हुए कुमारखण्ड पहुंचा।यह प्रखंड मुख्यालय था ।प्रखंड के निकट चौक पर चाय-पान और मिठाई की कुछ छोटी दुकाने थीं। प्रखंड में कोई बैंक नहीं था । प्रस्तावित भवन फ़्लैटनुमा साफ सुथरा बड़े परिसर वाला था ।पूर्णिया में उस समय पदस्थापित सार्जेंट मेजर श्री गौरी शंकर सिंह का यह मकान था ।बगल में बड़े परिसर वाले दो भवन और थे ।एक श्री एन के सिंह,एस पी(सी बीआई)का व दूसरा अंग्रेजो के समय के एस डी ओ स्व शिव नारायण सिंह का । ड्योढी के नाम से जाने जाते थे ये ।लोगों का व्यवहार व भवन दोनों अच्छा लगा ।मुझे शांत व साफ-सुथरी जगह चाहिए थी। पूर्णिया लौटने पर मैने हां कहा ।इस प्रकार बैंक की पांचवी शाखा का उदघाटन २७-०५-१९७७ को हुआ ।पहले बैंक का कार्यक्षेत्र पुराने पूर्णिया एवं सहरसा जिलो तक ही सीमित था । कटिहार जिला बाद में जुडा ।वर्षो बाद सहरसा व पूर्णिया तीन तीन जिलो में बटा ।सभी जिलो का मौसम व आर्थिक स्थिति एक जैसी ही थी।कोसी,महानंदा व इनकी सहायक शाखाओं की बाढ की त्रासदी से यह क्षेत्र वर्षो से जूझता रहा है।आवगमन आज जैसा सुगम नहीं था। मजदूरो/ गरीबो का शोषण चरम पर था ।बधुआ मजदूरी की प्रथा अलिखित रूप में जारी थी। मिला जुला कर अर्धसामंती व्यवस्था चल रही थी ।
शाखा खोलने के क्रम में एवं उसके बाद भी खाता खुलवाने में क्षेत्र में अविश्वाश का वातावरण था । चिट फंड वाले हजारो लोगों का पैसा लेकर भाग गए थे ।पांच रूपए मात्र से खाता मुश्किल से खुल रहे थे। सौभाग्यवश प्र वि पदा स्व0 श्याम विहारी सहाय बड़े समझदार व व्यावहारिक व्यक्ति थे।उनके तथा जनप्रतिनिधियों के सहयोग से गांवों में बैठकें कर व अपने कार्य कलाप से हमने विश्वास पाने में सफलता पाई । आज की पीढ़ी को पाँच रुपये का महत्व तब समझ आयेगा जब वे जानेंगे की हमारा प्रथम वेतन रू 708.40 था जो आज से ४३ वर्ष पहले बहुत लगता था । बैंक विहीन इस प्रखंड के चौक पर चाय,पान,मिठाई की दुकानों के अलावा चार-पांच जरुरी समानो की दुकाने भी थीं ।मुख्य बाजार मुरलीगंज ही था।आवागमन के लिए दो-तीन पुराने रिक्शे थे।साईकिल व बैलगाड़ी मुख्य सवारी थी।सुना था कि अधिकतर घरो में एक समय ही चूल्हा जलता था । गरीबी एक चुनौती थी। कृषि मुख्य उद्यम था ।हर गांव में दो तीन पक्के मकान के अलावा झोंपड़ियां ही नजर आती थीं ।
सबसे पहले आवागमन को सुगम बनाने का कार्य किया 10 रिक्शा व एक तांगा वितरण कर।चौक की दुकानों को वित्त देकर हमारा सहायक का बोर्ड लगवाया जिससे लोगो का विश्वास बढ़ता गया और हम जुड़ते गये।धीरे धीरे क्षेत्र में इतना विश्वास बढ़ गया कि कोई समस्या आने पर लोग राय लेने आते थे । कुछ रोचक प्रसंग के उल्लेख के विना आज की पीढ़ी को विश्वास नहीं होगा कि कैसी आत्मीयता हमने पायी और लोग कितने सरल थे ।
कुछेक रोचक प्रसंग:1)बैंक से टका निकले छै बैल केना निकलतै –मुझे पूरी तरह याद हैं करवैली के श्री राम प्रसाद साह। मैं प्रायः शाम को बैंक के बाहर परिसर में बैठा करता था। तीन दिनों से एक आदमी को बाहर खड़ा देखकर बुलाया तो पता चला कि वे वर्षा में पानी हेल कर मुझसे मिलने आते थे लेकिन डर से नही मिलते थे।उनके अनुसार बैल उनका मर गया था,खेती नही हो पा रही थी। उन्हें पता था कि बैंक से टका निकलता है ,बैल कैसे निकलेगा।मुझे सही आदमी मिला था।बैंक से बैल निकालकर मुझे दिखाना था इसलिए प्रखंड से आवेदन मंगाकर ॠण स्वीकृति के बाद एक तिथि पर सिंघेश्वर हाट जाकर वयाना देकर पसंद का बैल तय करने को कहा तो उनके पास बयाना देने की भी राशि नहीं थी ।फिर एक रुपया वयाना देकर बैल छेकने की बात कहकर भेजा। उन्होंने ६५0 रुपया में एक नया बैल ख़रीदा प्रखंड पशु चिकित्सा पदा. के साथ । र्बैंक से यह पहलापशु क्रय था। तीन दिन बाद फिर वह व्यक्ति आकर बताने लगे कि उनके यहाँ बैल देखने की भीड़ रोज आती थी।लोगों को विश्वास नहीं होता था बिना देखे कि बैंक से बैल कैसे निकला।
2 -शालीनता देखिये उस समय की: किसी वामपंथी पार्टी के स्थानीय एक युवक नेता थे।हम एक दूसरे को जानते थे ।भले ही उन्होंने अन्य को बैंक पहुँचने में मदद की हो लेकिन संकोचवश अपनी बात कभी नहीं बोले थे ।एक दिन लम्बे पन्ने पर उनके द्वारा लिखित एक कविता मिली जिसमें तीन छंदो में मेरी महानता की प्रशंशा थी (महानता उनका शब्द है) और चौथे में उनकी बैल की जरुरत की व्यथा । मै उनकी आर्थिक स्थिति से अवगत था। उन्हें बुलवा कर प्रक्रिया पूरी होने के बाद न केवल उन्हें बैल खरीदवाया बल्कि फसल ऋण भी देकर राहत पहुँचाई । ये कविता आज भी मेरे पास सुरक्षित है .
3- आदिवासियों की ईमानदारी व विश्वास : विशनपुर पंचायत में एक पथराहा टोला था जहाँ आदिवासियों का तीस- चालीश परिवार रहता था ।जानकारी मिली कि ये सभी बेंत का डगरा ,टोकरी बनाने का काम करते हैं ।गाँव के ही महाजन से अधिक सूद पर पैसा लेकर वर्ष में दो बार बेत काटने जाते थे।उसी से वर्ष भर डगरा बनाते थे । वो महाजन भी बैंक आते थे।आदमी बड़े भद्र थे।चूंकि वहाँ नदी पार कर जाना पड़ता था व कोई आदिवासियों के विश्वास का व्यक्ति भी मुझे चाहिए था ।इसलिए उन्हें विश्वास में लेकर अपनी मंशा बताई ।उनकी महाजनी को क्षति होने की बात थी ।फिर समझाने पर वे तैयार हुए ।उनके एवं मुखिया जी के सहयोग से वहां तीन वार गया –कभी घोड़ा से तो कभी नाव से टपकर साईकिल से।महाजन के ही सहयोग से उन्ही की दरवाजा पर बैठक में सभी आदिवासी आते थे। पहली बार में स्पष्ट कहा गया कि सरकार/बैंक से ॠण नहीं लेगे ।पता नही उन्हें क्या डर था ।दूसरी बार में कुछ युवक सकरात्मक लगे ।तीसरी बार में २५०/प्रति व्यक्ति ऋण लेने पर सहमत हुये ।उन्हे बैकिंग व्यवस्था से जोड़ना था इसलिए एक कैम्प लगाकर सभी को २५०/ऋण प्रदान किया गया । ऋण वितरण के कुछ दिनों बाद उधर से गुजरा तो देखा कि सबके घरो पर बैक का हमारा सहायक वाली छोटी पट्टिका लगी थी ।बाद में बहुतो ने २५००/का कर्ज लेकर कारोबार बढाया था ।वसूली भी समय पर देते थे।उनका विश्वास जीतकर बैंक से जोडना मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी उस समय में।
यह एक प्रतीकात्मक उदाहरण है कि किस प्रकार बैंक से लोगो को जोड़ा गया।मै उस महाजन को भी धन्यवाद देता हूँ जिनके यहाँ मेरा सत्कार भी होता था और इस सद्प्रयास में उनके कारोवार का नुकसान भी हुआ । हाँ आदिवासियों में जागृति जरूर आई और उनका भला भी हुआ ।आज के समय में दुर्लभ हैं ऐसे लोग ।
4- कुछ इधर-उधर की- कुमारखंड में बैक कर्मियों को हर वर्ग का सहयोग,स्नेह व सम्मान मिला । यह क्षेत्र यादव बहुल था। प्रखंड प्रमुख,विधायक,पूर्व विधायक व सांसद सभी यादव थे ।लेकिन सभी मृदुभाषी व भद्र थे ।बैंक के प्रति लोगों का रुझान बढाने में उनका सहयोग चिरस्मरणीय है । बैंक आने में भी उन्हें संकोच नहीं होता था । क्षेत्र की भाषा मैथिली है जो काफी मधुर है। मै ठहरा भोजपुरी प्रभावित हिंदी भाषी।भाषा और उम्र दोनों कड़ी थी।भले लोग सामने जो बोलें लेकिन पीछे बोलते थे कि आरा- बलिया का है,किसी की सुनता नहीं। कुछ दुखी लोग हर जगह होते है जो शरारत भी कर बैठते हैं । एक दिन एक अधिकारी बैंक आए।चाय पीने के क्रम में हंसकर बोले कि उपाध्याय जी आप लोगो की सुनते नहीं और लोगों को डांट कर भगा देते हैं, आपकी यही शिकायत पी एम ओ में हुयी है ।लेकिन यहाँ तो आपके प्रशंशक ही बहुत हैं ।लगता है कोई शरारत किया है। उसके बाद वो चले गए और मैं अपनी कडी रसीली भाषा के बारे मे सोचता रहा ।
5 – सहजता एवं सरलता का एक और उदाहरण – लोगो का धीरे धीरे इतना विश्वास बढ़ गया था कि किसी भी समस्या पर बेझिझक बात कहते थे । एक शाम को मै और श्री शारदा नन्द सिंह अधिकारी चौक की तरफ जा रहे थे कि एक अधेड़ ऋणी से भेट हुयी।अभिवादन व कुशल क्षेम के बाद उन्होंने सहज भाव से पूछा कि मैनेजर साहब “हमर महै बाहै नै छै ……”..मेरे मुंह से स्वतः स्फूर्त जो उत्तर निकला उसे मै लिख नहीं सकता हूँ लेकिन ये बता सकता हूँ कि ऋणी मुंह पर कपडा रख हँसते हुए एक तरफ भागे और शारदा बाबु दूसरी तरफ ।मै स्तब्ध खड़ा सोचता रहा ।
6- उस समय अंतोदय योजना के तहत भी 4%की सूद पर वित्तायन किया गया लेकिन प्रवर्तक बैंक के प्रतिनिधि के रूप में । प्रधान कार्यालय के निर्देश पर मुरलीगंज प्रखंड में कम्बल बुनकरों के समूह को भी कुमारखंड से वित्तायन किया गया था। उस समय समूह /क्लस्टर वित्तायन की चर्चा भी नहीं सुनी थी ।लेकिन कुमारखण्ड में ही दो क्लस्टर वित्तायन का सुखद अनुभव मुझे हो गया था । अब तो वक्त बहुत बदल गया है। वर्तमान में साथियों को क्षेत्र में काम करने में अलग प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है ।वक्त वक्त की बात है।
यह भी जानिए –जिला से समन्वय के कारण १९७८ में बैंक की सबसे बड़ी जमा राशि रू७.५० लाख जिला स्तर से सर्वप्रथम कुमारखण्ड शाखा को मिली थी । बाद में 2.50 लाख छातापुर व पिपरा शाखाओं को भेजा गया था।–चार सालों के मेरे कार्यकाल में प्रखंड पंचायत समिति से किसी व्यवसयिक बैंक की शाखा खोलने का प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था ।हमारी रामनगर व रहटा शाखायें ही खुल सकीं थीं।
संस्मरण अतिसुन्दर, हृदयग्राही व तात्कालिक परिस्थितियों को दर्शाती एक जीवंत कथा है, वर्तमान पीढ़ी को इससे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला.
एक बृक्ष को जिस प्रकार से लगाने के पश्चात माली बडा होते हुए देखकर सूकून से गौरवान्वित होता है कुछ ऐसी ही अनुभूति इस संसमरण को पढकर हुई। 👌
बहुत ही जीवंत चित्रण। हृदय स्पर्शी।
बहुत ही सुंदर और रोचक भी।मै भी पुरानी यादों मे खो सा गया।जिज्ञासा ऐसी कि अगले अंक का इंतजार है
मै दिनाक 20.11.1980 को कोशी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में योगदान किया था।श्री रमेश उपघ्याय जी द्वारा हमारा बैंक के प्रधान कार्यालय का उद्घाटन,पहला अध्यक्ष महोदय और वे सात बैंक रूपी भवन का मुख्य पीलर Late F A Khan,Late H D Rajakar, Late T K Mishra,Late H K Pashan, Late R K Singh,Shri M P Sah & Shri Ramesh Upadhyay के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए तथा शुरुआती दौड़ में बैंक कि शाखाये खोलने में आई बाधाएं को कैसे सात महारथियों ने झेला था जानकार उन लोगों के प्रति गर्व का अनुभव होता है।इसके बाद कई रथियों ने भी बैंक को आगे बढाने में बहुत सहयोग किया जिसमें श्री डी0 बी0 मिश्रा,स्व0 एस0 आई0 आलम,श्री चन्दन कुमार चटर्जी,श्री बी0 के0 सिंह,श्री आर0 एस0 सिंह,श्री राजकुमार प्रसाद,श्री राजेश कुमार का नाम भी उल्लेखनीय है।जिन लोगो ने मिलकर यह दिखा दिया था कि 18 माह तक अध्यक्ष महोदय के नहीं रहने के वावजूद इस मजबूत पिलरों ने बैंक रूपी भवन को आये कई आँधी तूफानों से हिलने तक नहीं दिया।यह सच मुच स्वर्णाक्षरों में लिखने वाला इतिहास है।मुझे याद है एक समय हालोगों को वेतन मिलने में भी आफत या गया था।अधिक से अधिक deposit निकल रहा था।बैंक कब बंद हो जाय कहना मुश्किल था।उस समय श्री डी0 बी0 मिश्रा जी ने आगे बढ़कर NPA खाताओ का DICGC claim करवा कर बहुत राशि बैंक को दिलवाएं थे,और बैंक को पुनः सही जगह पर लाकर खड़ा किया था।उन्ही महानुभव और हमारे साथियों के बदौलत ही कोशी ग्रामीण बैंक अच्छा लाभ कमाया था और कोशी ग्रामीण बैंक UBGB में सबसे ज्यादा जिला के साथ विलय हुआ और अपना कोशी का नाम सबसे ऊपर रहा।
प्रशांत कुमार घोष,मधेपुरा।
आप सबको अच्छा लगा यह जानकर बहुत सन्तोष हुआ ।यादों को एक साथ समेटना कठिन है इसलिए धीरे-धीरे परते खुलेंगी ।
लगता है कि कुछ मित्र लिंक खोल नहीं पा रहे हैं या पढने की अभिरुचि ही नहीं है ।श्री चौधरी जी ने जो मंच बनाया है उसका सकारात्मक उपयोग होना चाहिए ।
आप सबको अच्छा लगा यह जानकर बहुत सन्तोष हुआ ।यादों को एक साथ समेटना कठिन है इसलिए धीरे-धीरे परते खुलेंगी ।
लगता है कि कुछ मित्र लिंक खोल नहीं पा रहे हैं या पढने की अभिरुचि ही नहीं है ।श्री चौधरी जी ने जो मंच बनाया है उसका सकारात्मक उपयोग होना चाहिए ।