भारतवर्ष का अंधकार-युगीन इतिहास

✍️ डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल की दृष्टि से

📍 प्रस्तावना

भारतीय इतिहास में 150 ईस्वी से 350 ईस्वी तक का कालखंड प्रायः “अंधकार-युग” (Dark Age) कहा जाता है। इस अवधि को “अंधकार” इसलिए माना गया क्योंकि न तो इस समय कोई विशाल अखिल भारतीय साम्राज्य विद्यमान था और न ही पर्याप्त साहित्यिक अथवा अभिलेखीय स्रोत उपलब्ध हैं। डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल का मत था कि यह काल भारतीय इतिहास में राजनीतिक विघटन, आर्थिक अवनति और सांस्कृतिक ठहराव का युग था।


1. राजनीतिक स्थिति

  • कुषाण साम्राज्य का पतन : कनिष्क के उत्तराधिकारियों के बाद कुषाण सत्ता उत्तर-पश्चिम भारत में धीरे-धीरे लुप्त हो गई।
  • सातवाहन साम्राज्य का अंत : दक्कन और दक्षिण भारत में सातवाहन शक्ति भी क्षीण होकर समाप्त हो गई।
  • छोटे-छोटे राज्यों का उदय : नाग, आंध्र, अभिर, शक आदि अनेक स्थानीय वंश सत्ता में आए।
  • अराजकता की स्थिति : किसी स्थायी, मजबूत सत्ता का अभाव था। राजाओं का उदय-पतन शीघ्रता से होता रहा और जनता असुरक्षा में जीती रही।

2. सामाजिक स्थिति

  • वर्णव्यवस्था में असंतुलन : क्षत्रिय शक्ति का ह्रास हुआ जबकि ब्राह्मणों का वर्चस्व बढ़ने लगा।
  • परशुराम की कथा का प्रचलन इस युग में व्यापक हुआ, जो क्षत्रिय-पतन और ब्राह्मणवादी प्रभाव का प्रतीक माना गया।
  • जनजीवन में अशांति : छोटे शासकों के आपसी संघर्ष से सामान्य जनता असुरक्षित रही और सामाजिक जीवन अस्थिर बना रहा।

3. आर्थिक स्थिति

  • व्यापार का ह्रास : कुषाण और सातवाहन काल में जो विदेशी व्यापार (विशेषकर रोमन व्यापार) फल-फूल रहा था, वह इस युग में लगभग समाप्त हो गया।
  • मुद्रा प्रणाली का पतन : प्रचलित सिक्कों की शुद्धता घट गई, स्थानीय शासकों ने अशुद्ध धातु के सिक्के चलाए।
  • कृषि पर निर्भरता : व्यापार और शिल्पकला के पतन से समाज मुख्यतः कृषि पर आश्रित हो गया।

4. सांस्कृतिक स्थिति

  • साहित्यिक अभाव : इस युग में महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियाँ सामने नहीं आईं। इसी कारण इसे सांस्कृतिक दृष्टि से भी “अंधकारमय” कहा गया।
  • धार्मिक संक्रमण : बौद्ध धर्म का प्रभाव घटता गया और ब्राह्मणवादी परंपराएँ पुनः बलवती होने लगीं। नागवंशीय शासक विशेष रूप से ब्राह्मण धर्म के संरक्षक बने।
  • कला और स्थापत्य में ठहराव : कुषाण और सातवाहन काल की समृद्ध कला इस काल में शिथिल हो गई।

5. डॉ. जायसवाल का मूल्यांकन

डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल के अनुसार यह युग राजनीतिक दृष्टि से विघटन और अराजकता का काल था। सामाजिक दृष्टि से ब्राह्मणवादी प्रभाव बढ़ा और क्षत्रिय शक्ति क्षीण हुई। आर्थिक दृष्टि से व्यापार-पतन और मुद्रा-संकट ने समाज को प्रभावित किया। सांस्कृतिक दृष्टि से यह काल सृजनशीलता से शून्य रहा। उनके मत में यह वास्तव में “संक्रमण काल” था, जिसने आगे चलकर गुप्त वंश के स्वर्ण युग के लिए भूमि तैयार की।


6. अंधकार से उजाले की ओर

लगभग 320 ईस्वी में गुप्त वंश के उदय के साथ भारतीय इतिहास का नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। गुप्तकालीन साम्राज्य ने राजनीतिक स्थिरता, सांस्कृतिक उत्कर्ष और आर्थिक समृद्धि प्रदान की। डॉ. जायसवाल मानते हैं कि गुप्त युग की चमक उसी “अंधकार युग” से निकलकर संभव हुई।


निष्कर्ष

150 ईस्वी से 350 ईस्वी का कालखंड, डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल की दृष्टि में, भारतीय इतिहास का वास्तविक “अंधकार युग” था। यह काल राजनीतिक विघटन, सामाजिक असंतुलन, आर्थिक पतन और सांस्कृतिक शून्यता से परिपूर्ण रहा। किन्तु यही काल भविष्य में गुप्तकालीन पुनर्जागरण की पृष्ठभूमि बना।


✍️ शोध लेखक
© अशोक कुमार चौधरी प्रियदर्शी
मुख्य संपादक: नमस्ते bharat ई पत्रिका
संस्थापक: कौटिल्य ज्योतिष शोध संस्थान, कटिहार (बिहार)
विचारक, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता
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