Category: Poem

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जिंदगी भर प्रयास ही प्रयास

प्रयास अँधेरे कमरे में बिछावन पर लेटे हुए सिरहाने पर सर रख सोनेका प्रयासदिन भर हुई मुलाकातों मेंछुपे प्रश्नो को ढूंढने का प्रयासहर परीक्षा में टॉप करने का प्रयासहार कर सब कुछ जीता हुआ दिखाने का प्रयासबड़ा घर बड़ी गाड़ी का प्रयासबड़ा बैंक बैलेंस बनाने का प्रयासजमीन छोड़ आसमान में उड़ जाने का प्रयासहमेशा दूसरों…

कैसे उस देही को छोड़ा कैसे नव शरीर में आया

इस जग में आने से पहलेमैं कौन से जग में था ,जल में था या थल में थाआकाश में था , पाताल में थामैं कौन शक्ल में था ।——-————कौन नाम था , कौन काम थाकौन दशा थी , कौन दिशा थीप्रिय जन मेरे , कौन कौनइसी लोक या और लोकथा कौन पता मेरा ।————- कैसे…

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मानव तु साथी बन, पथ में अनुरागी बन

मल्लिका रॉय (घोष),लखनऊ मानव तु साथी बन, पथ में अनुरागी बन ।असमंजस उलझन में, आकर सहगामी बन।जीवन की रातों में, हर दिन के ख़्वाबों में अविरल जल धारा बन।शशिधर सी छाया बन।दुःख की बरसातो में, खुशियों की राहों में मन की एक आशा बन।हर दिल की भाषा बन।संकोची राहों में, दिल की अरमानों में भू…

एक बार हमें करनी पड़ी

एक बार हमें करनी पड़ी एक बार हमें करनी पड़ी रेल की यात्रादेख सवारियों की मात्रापसीने लगे छूटनेहम घर की तरफ़ लगे फूटने इतने में एक कुली आयाऔर हमसे फ़रमायासाहब अंदर जाना है?हमने कहा हां भाई जाना हैउसने कहा अंदर तो पंहुचा दूंगापर रुपये पूरे पचास लूंगाहमने कहा समान नहीं केवल हम हैंतो उसने कहा…

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अनंत काल स्तब्ध है, तटस्थ है, नीबद्ध है

अनंत काल स्तब्ध है, तटस्थ है, नीबद्ध है।प्रकाश पुंज श्रृंखला शिशिर तले अखंड है।श्वास की ही ताल पर, प्रचंड कोप बज्र है।निर्माण प्राण स्वस्तिका अगम भी है सुगम भी है। प्राण पुष्प वेदना कभी थामे कभी बढ़े।विचित्र प्रेम पावनी त्याग पर अडिग भी है।गीत में वो नज़्म है प्रवाह है खयाल है।मेघ की गर्जना प्रफुल्ला…

काका’ वेटिंग रूम में फँसे देहरादून

‘काका’ वेटिंग रूम में फँसे देहरादून ।नींद न आई रात भर, मच्छर चूसें खून ॥मच्छर चूसें खून, देह घायल कर डाली ।हमें उड़ा ले ज़ाने की योजना बना ली ॥किंतु बच गए कैसे, यह बतलाएँ तुमको ।नीचे खटमल जी ने पकड़ रखा था हमको ॥ हुई विकट रस्साकशी, थके नहीं रणधीर ।ऊपर मच्छर खींचते नीचे…

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जिंदगी की इस आपाधापी में

जिंदगी की इस आपाधापी में,कब जिंदगी की सुबह से शाम हो गई,पता ही नहीं चला। कल तक जिन मैदानों में खेला करते थे,आज वो मैदान नीलाम हो गए,पता ही नहीं चला। रूह आज भी बचपन में अटकी,बस शरीर जवान हो गया। गांव से चला था,कब शहर आ गया पता ही नहीं चला। पैदल दौड़ने वाला…

seagull, bird, water bird

मन की बात

जरा उडक़र तो देखो मकड़ी भी नहीं फँसती,अपने बनाये जालों में। जितना आदमी उलझा है,अपने बुने ख़यालों में…।। तुम निचे गिरके देखो…कोई नहीं आएगा उठाने…!!! तुम जरा उडक़र तो देखो…सब आयेंगे गिराने……!!!   अशोक कुमार चौधरी “प्रियदर्शी”