एक जुराब की आत्मकथा: __विजयकान्त द्विवेदी
एक जुराब की आत्मकथा ————————————— मैं एक फटा हुआ जुराब, मोजा, या साक्स हूं।नित्य पैरों से रौंदा खाकर मेरी यह स्थिति है कि मैं आज अच्छे समाज में नहीं जा सकता। संभव है कि कुछ दिनों के बाद मैं कचरे के ढेर में चला जाऊं। फिर धूल मिट्टी में मिलकर अपना अस्तित्व खो दूं। मेरे…








