चुनाव परिणाम, तथाकथित विश्लेषकों की बोलती बंद ?

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चुनाव विश्लेषण: विश्वसनीयता व निरपेक्षता

 

क्रिकेट और राजनीति में मेरी समझ ज्यादा नहीं है, न ही दिलचस्पी है। लेकिन मैदान पर पाकिस्तान के साथ मुकाबले को कभी-कभार देख लिया करता था। ऐसे ही सिर्फ उत्तरप्रदेश के चुनावी मुकाबले को बीच-बीच में हवा का रुख समझने के लिए देखा भर था। सात फेरों में हुए उत्तरप्रदेश के चुनावों में शुरुआती फेरे किसी चुनावी मुकाबले के ही थे लेकिन मुझे लगा कि हर फेरे के बाद यह चुनाव देवासुर संग्राम की शक्ल लेता गया।

सबसे आखिरी फेरे के बाद मैंने यूट्यूब चैनलों पर कुछ समय बिताया। संतोष भारती के किसी शो में अभय दुबे नाम के विश्लेषक के शब्द सुने-“हर तरफ परिवर्तन की आहट है। वो जमाना गया जब मोदी की मीटिंग में लोग उत्साह से नारे लगाते थे। इस बार ठंडी लहर है। किसान आंदोलन ने विपक्ष को मुखर बनाया। स्थानीय एंटीइंकंबेंसी भारी पड़ने वाली है।’ “द वायर’ की वीरांगना आरफा शेरवानी काशी विश्वनाथ के एक महंत राजेंद्र प्रसाद तिवारी को पकड़ लाई थी, जो बीजेपी की पराजय को रेखांकित करते हुए नाव पर सवार होकर उवाच रहे थे-“ये धर्म के व्यापारी लोग हैं।’ अंबरीश कुमार के “सत्य’ नाम के चैनल पर श्रवण गर्ग सपा को दो सौ से सवा दो सौ सीटें प्रदान करते हुए कह रहे थे-“बीजेपी को जबर्दस्त धक्का लगने वाला है। उनकी सवा सौ सीटें कम हों तो चमत्कार नहीं होगा। अब पूरे परिदृश्य से योगी जैसे लोग गायब होने वाले हैं।’ अनिल चमड़िया के ज्ञान चक्षु एंटी मुस्लिम फोबिया को निरर्थक देखते हुए ऐसे मसलों की तरफ लौटने का ज्ञान दे रहे थे जो हर समय संचालित हों।

ये चंद उदाहरण हैं। बीते सालों में कई बड़े चैनलों मेंं एंकर के तौर पर जाने-पहचाने और अब यूट्यूब पर अपनी गुमटियां सजाए हुए अनगिनत पत्रकार पानी पी-पीकर यूपी में किसी बड़ी उलटफेर के गणित सड़क छाप ज्योतिषियों की तरह पोथियां लिए बता रहे थे। प्रभु चावला, आशुतोष, अभिसार, पुण्य प्रसून वगैरह। अजीत अंजुम को तय लग रहा था कि बीजेपी के रिपीट होने का माहौल नहीं है, जबकि पूरे अभियान की कवरेज में हर जगह आम लोगों ने उनकी मंशा के विपरीत मोदी-योगी के गाने उन्हें सुर में सुनाए थे। मगर इनमें से कोई जनता के सुर को पकड़ने की बजाए अपना ही राग आलाप रहा था। उनसे चर्चा में समीरात्मज मिश्र फरमा रहे थे कि बीजेपी को ओबीसी का डेंट लगा है। मुस्लिम वोट भी एकतरफा सपा को जा रहा है। एक महाशय तो किसान आंदोलन और राकेश टिकैत में वैसा करंट देख रहे थे, जैसे अंग्रेजों को दफा करने में कांग्रेस और महात्मा गांधी।

राजनीति और चुनावों को चार-चार दशकों से कवर करने वाले इन विद्वान विश्लेषकों की समस्त और सतत् ज्ञान चर्चाओं का निष्कर्ष था कि योगी आदित्यनाथ को कोई भटे के भाव नहीं पूछ रहा। बीजेपी का सूर्य अब अस्त होने को है। सोशल मीडिया पर सर्वाधिक प्रसारित दयानंद पांडे की श्रृंखला खुलकर वह कह रही थी, जो नतीजों में जाहिर हुआ। बिना किसी लागलपेट के यूपी का भोगा हुआ सच वे कह रहे थे।

अभिषेक तिवारी के शो पर पत्रकार सतीशचंद्र मिश्र के शब्द थे-“कोई फर्क नहीं आने वाला है। बीजेपी की 270-80 सीटें आ रही हैं तो इसका मतलब है कि लहर है, जो यहीं रुकेगी नहीं। 21 वीं सदी में आधा यूपी जंगल जैसा जीवन जी रहा था, जहां बिजली नहीं थी। 70 साल में गरीबों को जितने घर नहीं मिले, उतने 45 लाख घर पांच साल में बने। जल मिशन ने घरों में नल के जरिए जल पहुंचाया। यह काम कभी नहीं हुआ था। लोग भूले नहीं है कि अखिलेश ने वैक्सीन नहीं लगवाने के लिए मुहिम छेड़ी। लेकिन सरकार जुटी रही और कोराेना की तीसरी लहर कब आकर चली गई, पता नहीं चला। पहली बार कानून-व्यवस्था दुरुस्त होने से यूपी वालों ने सुखी जीवन का स्वाद लिया। सपा के समय गुंडई की पराकाष्ठा थी। लुटियंस के दलालों को यही नहीं दिखेगा। यूपी के वोटरों को पागल कुत्तों ने नहीं काटा है, जो वे सपा की तरफ लौटेंगे।’

जब प्रमुख टीवी चैनलों और उनके साथ संबद्ध एजेंसियां बीजेपी को 240 से 280 सीटें बता रही थीं तब यूट्यूब पर यह एक अलग ही लहर उलट दिशा में बह रही थी जो साफतौर पर सैफई के शहजादे की ताजपोशी की सुपारी लेकर सक्रिय थी। मतदाताओं में एक किस्म का भ्रम खड़ा करने में इस लहर के सवारों ने अपने दम-गुर्दे और एड़ी-चोटी का एकमुश्त जोर लगा रखा था।

शाहीन बाग के प्रेतों ने कर्नाटक की खूंटी पर हिजाब टाँगकर राष्ट्रीय परिधान की तरह पूरे देश में लहराया और यूपी के चुनावी माहौल में इसे भुनाने की कोशिश हुई कि बीजेपी मुस्लिमों के खिलाफ है। हिसाब यह लगाना चाहिए कि मुस्लिम बहुल इलाकों में हिजाबधारी महिलाओं की एकमुश्त कतारें वोट किसे देकर आईं? हिजाब घर वालों की तसल्ली के लिए था और वोट अपनी खुशी के लिए! किसान आंदोलन भी ताबूत में कील की तरह चमकाया गया, लेकिन टिकैत के इलाके में ही देख लीजिए वह कील चुभी किसे?

इन नतीजों का सार यही है कि सियासी मशीन के पुराने टूल्स घिस चुके हैं। जाति और मजहब का ऑइल एक्सपायरी डेट का है। सेक्युलर पंप की हवा खुद ही निकली हुई है। राजनीति अब सेठजी की दुकान नहीं रहने वाली कि बेटे के बेटे तिजोरियों पर बैठते रहेंगे। चुनावी संदर्भ में “परफार्मेंस’ शब्द के बारे में दो चुनाव पहले तक कोई नहीं जानता था। अब यह एक कसौटी है। आपको कुछ करके दिखाना होगा और कुछ करके दिखाने के लिए खुद की आंखों से ठीक से दिखाई देना जरूरी है, जिसे “विजन’ कहते हैं। खानदानी कुर्सी और उधार की बुद्धि के सहारे राजनीति के दिन लद चुके हैं। प्रधानमंत्री परिवारवादी राजनीति को लोकतंत्र के लिए बार-बार खतरा बताते आए हैं और जनता के गले यह बात उतर चुकी है।

यह महामंत्र इसलिए सिद्ध हो रहा है कि गुजरात में मोदी और शाह सरनेम के परिजन और नाते-रिश्तेदार टिकट और पार्टी में पदों से दूर सामान्य नागरिक की तरह जीवन जी रहे हैं। वैसे ही जैसे एक चैनल ने योगी आदित्यनाथ की एक बहन को बेहद साधारण हैसियत में रहते हुए इसी चुनाव में दिखाया। तीन सौ के नीचे आया बीजेपी का उतार उन नेताओं के लिए सबक है, जो एक बार एमएलए या मंत्री बनने के बाद ही आकाशीय हो जाते हैं। उन्हें अपनी अकड़ ढीली करनी होगी ताकि पकड़ मजबूत हो सके और उन्हें यह समझना होगा कि राजनीति खानदान भर के खाने-कमाने का कमाऊ जरिया नहीं है। उनके अंडे-बच्चे राजनीति से जितना दूर रहेंगे, उनकी विश्वसनीयता उतनी ही रहेगी। बेदाग चरित्र, अथक परिश्रम और निष्पक्ष सोच की टिकाऊ राजनीति के मानक बन रहे हैं। अगर वे ऐसे होते हैं तो यूट्यूब के चील और गिद्ध कितना भी चीख-पुकार मचाएं, असल परिणाम जनता ही दिखाएगी।

जहां तक यूपी का सवाल है, वह एक बदनाम और बीमार राज्य ही रहा है। जातिवादी और मजहबी राजनीति के लिए बदनाम और पिछड़ेपन के कारण बीमार। कांग्रेस के पुरजोर वाली सरकारें सिर्फ आजादी की लड़ाई की खुरचन खरोंचकर खा रही थीं। फिर सपा-बसपा के जाति ब्रांड धारावाहिक की कड़ियां आईं और कसकर यूपी का दम घोंटकर रख दिया। बीजेपी की परंपरागत राजनीति में भी बदलाव का कोई बीज बचा नहीं था। वहां भी जातिवादी और परिवारवादी मानसिकता के रथी और सारथी सब थे।

2014 में देश की कुंडली में कोई शक्तिशाली ग्रह अवश्य ही अपनी कृपादृष्टि के साथ किसी अनुकूल स्थिति में आया होगा, जिसके बाद 2017 में यूपी की कुंडली में वैसी ही घटना घटी होगी। ग्रहों का कुछ ऐसा उलटफेर, जो एक लंबी महादशा का शुभारंभ हो और कुछ ऐसा जो लुक और फील दोनों को बदल दे। कश्मीर से लेकर केदारनाथ तक आैर अयोध्या से लेकर वाराणसी तक आए बदलाव बिना ग्रहों की दिशा परिवर्तन के संभव नहीं थे। पुराने पुच्छल तारे अपनी डूबती रोशनी के साथ अंधेरे में खोने काे अभिशप्त हैं।

मुझे ये नतीजे उन चेहरों पर मली हुई कालिख की तरह दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें लोकतंत्र को खानदानी राजनीति में बदले जाने में कोई दिक्कत नहीं है और जो अब तक जातीय गणित के हिसाब से ही राज्य और देश के भविष्य के गुणा-गणित करते रहे थे। उनके लिए देश दूसरे नंबर पर था, जाति और मजहब पहले था। ऐसे सारे बिकाऊ चेहरों पर कालिख हैं ये नतीजे। एक साफ आइना भी हैं ये नतीजे, जिसमें वे अपना चेहरा खुद देखें तो डर जाएं!

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