हिन्दू विरोधी है कांग्रेस द्वारा बनाया गया उपासना स्थल कानून 1991: अशोक चौधरी

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हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या विवाद मामले (Ayodhya verdict) में उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 {Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991} का उल्लेख किया, जो स्वतंत्रता के समय मौजूद धार्मिक उपासना स्थलों को बदलने (Conversion of Religious Places) पर रोक लगाता है.

यह अधिनियम बाबरी मस्ज़िद (वर्ष 1992) के विध्वंस से एक वर्ष पहले सितंबर 1991 में पारित किया गया था।
उद्देश्य:
इस अधिनियम की धारा 3 (Section 3) के तहत किसी पूजा के स्थान या उसके एक खंड को अलग धार्मिक संप्रदाय की पूजा के स्थल में बदलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
यह अधिनियम राज्य पर एक सकारात्मक दायित्व (Positive Obligation) भी प्रदान करता है कि वह स्वतंत्रता के समय मौजूद प्रत्येक पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र को बनाए रखे।
सभी धर्मों में समानता बनाए रखने और संरक्षित करने के लिये विधायी दायित्व राज्य की एक आवश्यक धर्मनिरपेक्ष विशेषता (Secular Feature) है, यह भारतीय संविधान की मूल विशेषताओं में से एक है।
छूट (Exemption)
अयोध्या में विवादित स्थल को अधिनियम से छूट दी गई थी इसलिये इस कानून के लागू होने के बाद भी अयोध्या मामले पर मुकदमा लड़ा जा सका।
यह अधिनियम किसी भी पूजा स्थल पर लागू नहीं होता है जो एक प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या प्राचीन स्मारक हो अथवा पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 (Archaeological Sites and Remains Act, 1958) द्वारा कवर एक पुरातात्विक स्थल है।
दंड
अधिनियम की धारा 6 में अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर जुर्माने के साथ अधिकतम तीन वर्ष की कैद का प्रावधान है।
बरसों तक शांत रहने के बाद 1988 में अयोध्या के राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद ने जोर पकड़ लिया था। बीजेपी ने इसे एक आंदोलन का रूप दे दिया। लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से शुरू की रथयात्रा। 29 अक्टूबर को उन्हें अयोध्या पहुंचना था, लेकिन इससे पहले 23 अक्टूबर को उन्हें समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। बीजेपी के समर्थन वाली केंद्र की वीपी सिंह सरकार गिर गई। चुनाव हुए, कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार आई, लेकिन इस दौरान मंदिर निर्माण का आंदोलन बढ़ता ही चला गया। अयोध्या विवाद इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंच चुका था। और अयोध्या ही नहीं, जनता के बीच काशी-मथुरा का मामला भी उठने लगा। तब केंद्र सरकार को लगा कि देशभर के अलग-अलग धार्मिक स्थलों को लेकर ऐसे विवाद बढ़े तो हालात बेहद खराब हो जाएंगे। ऐसे में नरसिम्हा राव सरकार 11 जुलाई 1991 को प्लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्ट 1991 लेकर आई। यह ऐक्ट कहता है कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्थिति में था और जिस समुदाय का था, भविष्य में भी उसी का रहेगा। अयोध्या का मामला चूंकि हाई कोर्ट में था, इसलिए उसे इस क़ानून से अलग रखा गया।

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केंद्र सरकार जब यह क़ानून लाई, तब भी संसद में विरोध हुआ था। तब राज्यसभा में अरुण जेटली और लोकसभा में उमा भारती ने विरोध किया था और इस मामले को संसदीय समिति के पास भेजने की मांग उठाई। हालांकि ऐक्ट पास होकर अमल में आ गया। राम मंदिर विवाद पर विराम के बाद काशी और मथुरा सहित देशभर के लगभग 100 मंदिरों की जमीन को लेकर दावेदारी उठने लगी है, लेकिन इस क़ानून के कारण दावेदारी करने वाले अदालत का रास्ता नहीं चुन सकते। यही है विवाद की वजह।

बीजेपी नेता और एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने इस ऐक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि यह क़ानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्धों के संवैधानिक अधिकारों से उन्हें वंचित करता है। उनके जिन धार्मिक और तीर्थ स्थलों को विदेशी आक्रमणकारियों ने तोड़ा, उसे वापस पाने के क़ानूनी रास्ते को बंद करता है। याचिका में ऐक्ट की धारा 2, 3 और 4 को चुनौती दी गई है और उसे गैर संवैधानिक घोषित करने की गुहार लगाई गई है। याची के मुताबिक, ऐक्ट संविधान के समानता के अधिकार, गरिमा के साथ जीवन के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में दखल देता है। आइए जानते हैं कि याचिकाकर्ता ने क्या-क्या मुद्दे उठाए हैं :

1. प्लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्ट-1991 केंद्र ने बनाया था। केंद्र ने यह क़ानून बनाकर पब्लिक ऑर्डर के विषय को अपने पास ले लिया, जो कि राज्य का विषय है। तीर्थ स्थल और तीर्थ यात्रा भी राज्य का विषय है।

2. संविधान का अनुच्छेद-13(2) राज्य (स्टेट) को ऐसे क़ानून बनाने से रोकता है, जो किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार से उसे वंचित करे। संविधान के पार्ट 3 में जो अधिकार दिए गए हैं, उसमें मौलिक अधिकार शामिल हैं। कोई भी क़ानून बनाकर संवैधानिक अधिकार से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता। यह ऐक्ट हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख को अपने पूजा और तीर्थ क्षेत्र को वापस पाने के अधिकार से वंचित करता है। केंद्र के पास ऐसा अधिकार नहीं कि वह लोगों के कोर्ट जाने का रास्ता बंद कर दे।

3. राम जन्मभूमि इस ऐक्ट के दायरे में है, लेकिन कृष्ण जन्मभूमि नहीं। राम और कृष्ण, दोनों विष्णु के अवतार हैं। ऐसे मे क़ानून में विभेद किया गया है और यह अनुच्छेद-14 और 15 के समानता के प्रावधान का उल्लंघन है।

4. हर व्यक्ति को पूजा, प्रार्थना और इबादत का अधिकार है। हर धर्म के लोगों को धार्मिक प्रैक्टिस और उसे फैलाने का अधिकार है। यह अधिकार अनुच्छेद-25 के तहत सबको दिया गया है। लेकिन क़ानून में उस अधिकार से भी लोगों को वंचित किया गया है। 1991 ऐक्ट हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख के उस अधिकार से उन्हें वंचित करता है, जो उन्हें अनुच्छेद-26 के तहत मिला हुआ है। अनुच्छेद-26 के तहत संविधान में हर धर्म के लोगों को अपने तीर्थ और पूजा स्थल को बनाए रखने, उसके प्रबंधन और रख-रखाव और प्रशासन करने का अधिकार है। अनुच्छेद -29 में प्रावधान है कि हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध को यह अधिकार है कि वह अपनी हस्तलिपि और संस्कृति को संरक्षित करें। इस प्रावधान का भी क़ानून ने उल्लंघन किया है।

5. संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांत के तहत राज्य (सरकार) की जिम्मेदारी है कि वह अनुच्छेद-49 के तहत राष्ट्रीय महत्ता वाली जगहों को नुकसान पहुंचाने और तोड़े जाने से रोके। लेकिन इस ऐक्ट के प्रावधान उसके विपरीत हैं। राज्य पर इस बात की जिम्मेदारी है कि वह भारतीय संस्कृति के आदर्श स्वरूप विशाल और वैभवशाली विरासत को बचाए। राज्य को ऐसा क़ानूनी अधिकार नहीं है कि वह ऐसा क़ानून बनाए जो लोगों के मौलिक अधिकार में दखल दे।

6. 15 अगस्त 1947 को कटऑफ डेट फिक्स किया गया है। इस तरह से जिन विदेशी आक्रमणकारियों, आताताइयों ने धार्मिक स्थल नष्ट किए, उनकी हरकतों को वैध करार दे दिया गया। हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध को अपने धर्म की प्रैक्टिस, आस्था और उसे फैलाने का अधिकार है और इसे लिया नहीं जा सकता। संविधान के अनुच्छेद-13 के तहत ऐसे अधिकार को लेने पर मनाही है। यह ऐक्ट सीधे तौर पर न्याय और क़ानून के राज के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

7. मस्जिद का रुतबा या स्थान सिर्फ उसी स्ट्रक्चर को प्राप्त है, जो इस्लामिक विधि से बनाया गया है। अगर इस्लामिक क़ानून के ख़िलाफ़ जाकर कोई मस्जिद बनाई गई, तो वह मस्जिद नहीं कही जा सकती। देवी-देवता की संपत्ति हमेशा उन्हीं की रहती है। मंदिर की संपत्ति कभी ख़त्म नहीं हो सकती। अगर कोई बाहरी उस पर सैकड़ों बरसों तक क़ब्ज़ा कर ले तो भी वह रहती मंदिर की संपत्ति ही है। मूर्ति और देवी-देवता सुप्रीम गॉड हैं और वह विधिक यानी क़ानूनी व्यक्ति हैं। वह अनंत हैं और उन्हें समय के पाश में नहीं बांधा जा सकता।

8. केंद्र किसी से सिविल कोर्ट में सूट दाखिल करने और हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार नहीं छीन सकता। प्लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्ट-1991 किसी मामले के जूडिशियल रिव्यू के संवैधानिक व्यवस्था में दखल देता है। इस तरह देखा जाए तो संविधान के मूल ढांचे में केंद्र सरकार इस क़ानून के जरिये अतिक्रमण कर रही है।

9. सन 1192 से लेकर 1947 तक तमाम आक्रमणकारियों ने बर्बर हरकतें कीं। हिंदुओं, जैन, सिख और बौद्ध के धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया, लेकिन इस ऐक्ट ने हिंदू लॉ के उस प्रावधान को ख़त्म कर दिया, जिसमें कहा गया है कि देवी-देवता और मूर्ति और उनकी संपत्ति का कभी क्षरण नहीं हो सकता। भक्तों का उस संपत्ति को दोबारा से बहाल करने का अधिकार हमेशा बना रहता है। यह तयशुदा हिंदू क़ानून है कि देवी-देवताओं की संपत्ति हमेशा के लिए उनमें निहित होती है।

10. भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 और 15 के मद्देनजर अगर धर्म निरपेक्षता के सिद्धांत को देखा जाए तो साफ़ है कि राज्य कभी किसी धर्म के प्रति रुझान नहीं दिखा सकता। किसी धर्म के प्रति बेरुखी या विपरीत रवैया नहीं रख सकता, चाहे कोई बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक। ऐसे में क़ानून धर्म निरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

11. कोई मस्जिद अगर मंदिर की ज़मीन पर बनाई गई है तो वह मस्जिद नहीं हो सकती। यह न सिर्फ इस्लामिक लॉ के ख़िलाफ़ है, बल्कि इसका दूसरा आधार यह भी है कि जो ज़मीन और संपत्ति देवी-देवता की है वह हमेशा उन्हीं में निहित रहती है।

12. याची का सवाल है कि 1192 से लेकर 1947 तक विदेशी आक्रमणकारियों ने तीर्थस्थलों को जो नुकसान पहुंचाया और क़ब्ज़ा किया, क्या हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध उसे दोबारा पाने के लिए क़ानूनी रास्ता नहीं अपना सकते। भारत सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत से संबंधित तमाम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और समझौतों में हस्ताक्षरी है। ऐसे में केंद्र उन तमाम समझौतों और संधियों को मानने के लिए बाध्य है।

ये तो हुईं ऐक्ट के ख़िलाफ़ दलीलें, लेकिन इसके पक्ष भी तर्क हैं। सबसे बड़ा तर्क तो क़ानून व्यवस्था का ही है। हाल ही में उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने कहा था कि मुस्लिमों को देश की वे 11 मस्जिदें हिंदुओं के हवाले कर देनी चाहिए, जिन्हें मुगल बादशाहों ने मंदिर तोड़कर बनवाया था। इनमें काशी-मथुरा भी हैं। इसके अलावा देशभर में लगभग सौ मंदिरों पर दावेदारी उठी है। अगर प्लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्ट-1991 नहीं होता तो विवाद बढ़ता और धार्मिक उन्माद फैलने का ख़तरा हो सकता था। अब जब ऐक्ट को चुनौती दी गई है और सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर परीक्षण का फैसला लेते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है देश की निगाहें फिर से शीर्ष अदालत की ओर हैं।

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