कलवार-जायसवाल जाति का इतिहास: अशोक चौधरी

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कलवार-जायसवाल जाति का इतिहास

अशोक कुमार चौधरी

कलवार जाति का सम्बन्ध हैहय वंश से जुड़ा है , हैहय वंशी क्षत्रिय थे,इसके पीछे इतिहास है,वेदों और हरिवंश पुराण में प्रमाण मिलता हैं की कलवार वंश का उत्पति भारत के महान चन्द्र वंशी क्षत्रिय कुल में हुआ हैं. इसी वंश में कार्तवीर्य,सहस्त्रबाहू जैसे वीर योद्धा हुए सहस्त्रबाहू के विषय में एक कथा यह भी प्रचलित है कि इन्ही से राजा यदु से यदुवंश प्रचलित है , जिसमे आगे चलकर भगवन श्री कृष्णा एवं बलराम ने जन्म लिया था. इसी चन्द्रवंशी की संतान कलवार हैं.
कलवार समाज का बहुत बड़ा वर्ग भगवन श्री कृष्णा के बड़े भ्राता भगवन बलराम (बलभद्र) को अपना इष्टदेव मानते हैं. (शोध का विषय है की कलवार जाति का यदुवंश के साथ क्या रिश्ता है)

कलवार वैश्य एवं जाति प्रथा:

भारत वर्ष में जाति प्रथा आदि काल से चली आ रही हैं, समाज की वर्ण और व्यवस्था आज जातियों व उपजातियो में बिखर चुकी हैं,दिन प्रतिदिन यह बिखरती जा रही हैं, भारत को संपूर्ण रूप से देखें, जहां विभिन्न समुदाय और वर्ण व्यवस्था हैं और सबको अपने समुदाय से लगाव है | पर हमारी कलवार वैश्य समुदाय विभिन्न वर्गों में बट चुकी है , जैसे कपूर, खन्ना, मल्होत्रा, मेहरा, सूरी, भाटिया , कोहली, खुराना, अरोरा, अग्रवाल , वर्णवाल, लोहिया आदि, अहलूवालिया, वालिया, बाथम, शिवहरे, माहुरी, शौन्द्रिक, साहा, गुप्ता, महाजन, कलाल, कलार , नडार, वर्मा, कर्णवाल, सोमवंशी, सूर्यवंशी, जैस्सार, जायसवाल, व्याहुत, चौधरी, प्रसाद, भगत आदि

कलवार हैहय वंश चन्द्रवंशी का वंशावली:

हरिवंश पुराण के अनुसार महर्षि वैशम्पायन ने राजा भारत को उनके पूर्वजों का वंश वृत्त बताते हुए कहा कि राजा ययाति का एक तेजस्वी पुत्र हुआ ” यदु ” यदु के पांच पुत्र हुए १.सस्त्रद २. पयोद ३.क्रोस्टा ४. नील और ५.आन्जिक नाम के हुये। इनमे से पहला पुत्र सहस्त्रद के परम धार्मिक तीन पुत्र १.”हैहय” २. हय ३. वेनुहय नाम के हुए . हैहय के पुत्र धर्म नेत्र हुए उनके कार्त और कार्त के साहन्ज आत्मज है। जिन्होंने अपने नाम से साहन्जनी नामक नगरी बनाई, साहंज के पुत्र और “हैहय” के प्रपोत्र राजा महिष्मान हुए जिन्होंने महिस्मती नाम की पूरी बसाई,(वह आज भी धर्मध्वजा को लहरा रही है एवं मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में महेश्वर के नाम से प्रसिद्द है. महेश्वर शहर मध्य प्रदेश के खरगोन जिलें में माँ नर्मदा के किनारें स्थित है.) महिष्मान के पुत्र प्रतापी भद्रश्रेन्य है जो वाराणसी के अधिपति थे, भद्रश्रेन्य के विख्यात पुत्र दुर्दम थे। दुर्दम के पुत्र महाबली कनक हुए और कनक के लोक विख्यात चार पुत्र १.कृतौज १. कृतवीर्य ३. कृतवर्मा ४. क्रिताग्नी थे। कृतवीर्य पुत्र अर्जुन हुए

कार्तवीर्य अर्जुन से कैसे सहस्त्रबाहु नाम पड़ा:

सहस्त्रबाहु का मूल नाम कार्तवीर्य अर्जुन था। वह बड़ा प्रतापी तथा शूरवीर राजा थे। उसने अपने गुरु दत्तात्रेय को प्रसन्न करके वरदान के रूप में उनसे हज़ार भुजाएँ प्राप्त की थीं। उन्होंने सभी सिद्धियाँ प्राप्त की थीं।जो सहस्त्रबाहू अर्थात सहस्त्रार्जुन नाम से विख्यात हुए . यही सहस्त्रबाहू सूर्य से दैदीप्यमान और दिव्य रथ पर चढ़कर सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत कर सप्तद्वीपेश्वर कहलाये और सम्पूर्ण विश्व में अधिष्ठित हुए. कहा जाता है कि सहस्त्र बाहू ने अत्रि पुत्र दत्तात्रेय की आराधना दस हजार वर्षो तक कर परम कठिन तपस्या की और कई दिव्य व चमत्कारिक वरदान प्राप्त किये |

सहस्त्रबाहु परशुराम युद्ध:

कहते है एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ जमदग्नि ऋषि (जमदग्नि ऋषि परशुराम के पिता) के आश्रम में विश्राम करने के लिए पहुंचा |महर्षि जमदग्रि ने सहस्त्रार्जुन को अपने आश्रम खूब स्वागत सत्कार किये| कहते हैं ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इन्द्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु गाय थी |महर्षि ने उस गाय के मदद से कुछ ही समय में देखते ही देखते पूरी सेना के भोजन का प्रबंध कर दिया |कामधेनु गाय के अदभुत गुणों से प्रभावित होकर सहस्त्रार्जुन के मन में कामधेनु गाय को पाने की उसकी लालसा जगी|महर्षि जमदग्नि के समक्ष उसने कामधेनु गाय को पाने की अपनी लालसा जाहिर की |सहस्त्रार्जुन को महर्षि ने कामधेनु के विषय में सिर्फ यह कह कर टाल दिया की वह आश्रम के प्रबंधन और ऋषि कुल के जीवन के भरण – पोषण का एकमात्र साधन है। जमदग्नि ऋषि की बात सुनकर सहस्त्रार्जुन क्रोधित हो उठा, उसे लगा यह राजा का अपमान है तथा प्रजा उसका अपमान कैसे कर सकती है | उसने क्रोध के आवेश में आकार महर्षि जमदग्नि के आश्रम को तहस नहस कर दिया, पूरी तरह से उजाड़ कर रख दिया ऋषि आश्रम को और कामधेनु को जबर्दस्ती अपने साथ ले जाने लगा | कामधेनु सहस्त्रार्जुन के हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गई और उसको अपने महल खाली हाँथ लौटना पड़ा |जब परशुराम अपने आश्रम पहुंचे तब उनकी माता रेणुका ने सारी बातें बताई | परशुराम ये सुनकर बहुत क्रोधित हुए और सहस्त्राअर्जुन और उसकी पूरी सेना को नाश करने का संकल्प लेकर महिष्मती नगर पहुंचे | वहाँ सहस्त्रार्जुन और परशुराम के बीच घोर युद्ध हुआ |परशुराम ने अपने दिव्य परशु से सहस्त्राबाहू अर्जुन की हजारों भुजाओं को काटते हुए उसका धड़ सर से अलग करके उसका वध कर डाला,सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने अपने सहयोगी क्षत्रियों की मदद से महर्षि जमदग्रि का उनके ही आश्रम में सिर काटकर उनका वध कर दिया | सहस्त्रार्जुन पुत्रों ने आश्रम के सभी ऋषियों का वध करते हुए, आश्रम को जला डाला | माता रेणुका ने सहायतावश पुत्र परशुराम को विलाप स्वर में पुकारा | जब परशुराम माता की पुकार सुनकर आश्रम पहुंचे तो पिता का कटा हुआ सिर और माता को विलाप करते देखा | माता रेणुका ने महर्षि के वियोग में विलाप करते हुए म्रत्यु को प्राप्त हो गईं | माता,पिता के अंतिम संस्कार करने के बाद अपने पिता के वध और माता की मृत्यु से क्रुद्ध परशुराम ने शपथ ली कि वह हैहयवंश का सर्वनाश करते हुए समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर पृथ्वी को क्षत्रिय विहिन कर देंगे | पुराणों में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने २१ बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करके उनके रक्त से समन्त पंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर को भर कर अपने संकल्प को पूरा किया है| कहा जाता है की महर्षि ऋचीक ने स्वयं प्रकट होकर भगवान परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोक दिया था तब जाकर किसी तरह क्षत्रियों का विनाश भूलोक पर रुका।

कलवार कैसे क्षत्रिय से वैश्य हुए:

कलचुरी गौरव के कामराज जयंती : अशोक चौधरी

जिस चन्द्र वंश ने अपनी पताका पूरे संसार में फैलाई,परशुराम द्वारा भी इस वंश को नष्ट करने का प्रयास किया गया,परिणाम यह हुआ की कुछ कुरुक्षेत्र में कुछ प्रभास क्षेत्र में लड़ मिटे,बांकी जो बचे उनसे चन्द्र वंश,हैहये कलवार वंश का नाम चलता रहा, राज कुल में पले बढे, कलवारो के सामने जीवन निर्वाह की बड़ी समस्या खड़ी हो गई, अतः क्षत्रिय धर्म कर्म छोड़कर वैश्य कर्म अपना लिया, व्यवसाय करने के कारण वैश्य या बनिया कहलाने लगे, इनमे से अधिकतर शराब का व्यवसाय करने लगे। कलवार शब्द की उत्पत्ति, मेदिनी कोष में कल्यापाल शब्द का ही अपभ्रंश कलवार हैहय क्षत्रिय हैं | पद्मभूषण डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक अशोक का फूल में लिखा हैं की कलवार वैश्य हैहय क्षत्रिय थे,सेना के लिए कलेऊ(दोपहर का खाना) की व्यवस्था करते थे, इसीलिए, वे तराजू पकड़ लिए और बनिया(वेश्य) हो गए,क्षत्रियो के कलेवा में मादक(मदिरा) द्रव्य भी होता था, इसी लिए ये मादक द्रव्यों का कारोबार भी करने लगे | श्री नारायण चन्द्र साहा की जाति विषयक खोज से यह सिद्ध होता हैं की कलवार उत्तम क्षत्रिय थे| गजनवी ने कन्नौज पर हमला किया था,जिसका मुकाबला कालिंदी पार के कल्वारो ने किया था, जिसके कारण इन्हें कलिंदिपाल भी बोलते थे, इसी का अपभ्रंश ही कलवार है|

कलवार समुदाय का अलग-अलग वर्गों में बट जाना:

कलवार जाति के तीन बड़े हिस्से हूए हैं,वे हैं प्रथम पंजाब दिल्ली के खत्री, अरोरे कलवार, यानि की कपूर, खन्ना, मल्होत्रा, मेहरा, सूरी, भाटिया , कोहली, खुराना, अरोरा, इत्यादि, दूसरा हैं राजपुताना के मारवाड़ी कलवार याने अगरवाल, वर्णवाल, लोहिया आदि. तीसरा हैं देशवाली कलवार जैसे अहलूवालिया, वालिया, बाथम, शिवहरे, माहुरी, शौन्द्रिक, साहा, गुप्ता, महाजन, कलाल, कराल, कर्णवाल, सोमवंशी, सूर्यवंशी, जैस्सार, जायसवाल, व्याहुत, चौधरी, प्रसाद, भगत आदि. कश्मीर के कुछ कलवार बर्मन, तथा कुछ शाही उपनाम धारण करते हैं, झारखण्ड के कलवार प्रसाद, साहा, चौधरी, सेठ, महाजन, जायसवाल, भगत, मंडल, आदि प्रयोग करते हैं. नेपाल के कलवार शाह उपनाम का प्रयोग करते हैं. जैन पंथ वाले जैन कलवार कहलाये.ब्रह्ममा से भृगु, भृगु से शुक्र, शुक्र से अत्री ऋषि , अत्री से चन्द्र देव, चन्द्र से बुद्ध, बुद्ध से सम्राट पुरुरवा, पुरुरवा से सम्राट आयु, आयु से नहुष, नहुष से ययाति, ययाति से पुरु, पुरु से चेदी कल्यपाल, कलचुरी, कलार , कलवार,वंश चला जो की जायसवाल, कलवार, शौन्द्रिक, जैस्सार, व्याहुत कहलाये. इस प्रकार से हम देखते हैं की कलवार जाति की उत्पत्ति बहुत ही गौरव पूर्ण हैं.

https://youtu.be/cktU_ppL6Co?list=PLla_5PTVosIpjCmYcPngRgUc1TDK1an5d&t=10

सहस्त्रबाहू एवं बलभद्र को आराध्य मानने वाले कलवार या हैहय समाज की तेजस्विता, बल और शोर्य का वर्णन करते हुए किसी कवि ने इन समाज बंधुओं के विषय कहा है

हैहय वंशी जगे तो, लाते है भयंकरता,
शिव साज तांडव सा, युद्ध में सजाते है।
शत्रु तन खाल खींचा, मांस को उलीच देत,
गीध, चील, कौए तृप्त , ‘प्रचंड’ हो जाते है।।
रुंड , मुंड, काट-काट , रक्त मज्जा मेदा युक्त,
अरि सब रुंध-रुंध, गार सी मचाते है।।
बढ़ाते शक्ति उर्बर, भावी संतान हेतु,
मातृ-ऋण उऋण कर, मुक्त हो जाते है।।

कलवार-जायसवाल इतिहास के झड़ोखों से :

चन्द्रवंश की अनेक शाखाओं में हैहय वंश प्रसिद्ध हुआ है। यायाति के प्रथम पुत्र यदु थे। प्रसिद्ध चन्द्रवंश की यदुवंश शाखा के अन्तर्गत हैहयवंश में परमप्रतापी सम्राट श्री कार्त्तवीर्य अर्जुन का जन्म, कार्तिक शुक्ल सप्तमी को हुआ था, जो श्रीसहस्त्रबाहु तथा राज राजेश्वर सहस्त्रबाहु अर्जुन के नाम से प्रख्यात हुए। हमारा समाज हैहय वंशीय सहस्त्रार्जुन कुल की चेदी शाखा है। जिसका इतिहास अत्यन्त गौरवपूर्ण है। छठी शताब्दी के मध्य इस शाखा ने अपनी पहचान कलचुरी नाम से बनायी थी। ई० सन 1001 के आसपास का काल कलचुरियों का स्वर्ण काल था। कलचुरियों की सबसे बड़ी और शक्तिशाली त्रिपुरी शाखा के सम्राट द्वितीय कोकल्स (ई० सन् 990-1015) में अपने पराक्रम और कुटनीति के लिए प्रख्यात थे। उनके पुत्र गांगेयदेव ( ई० सन् 1015-1041) उत्तर भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट थे जिन्होंने अपने साम्राज्य का चतुर्दिक विस्तार किया। उनके बाद उनका पुत्र लक्ष्मीकर्ण (ई० सन् 1041-1107) जो इतिहास में कर्ण नाम से विख्यात हुए. की गणना भारत के महानतम सम्राटों में की जाती है। उनके सम्राज्य का विस्तार उत्तर में कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश से लेकर दक्षिण में तमिलनाडु तक और पूर्व में असम से लेकर पश्चिम में गुजरात तक था। उसी काल में कलचुरियों की सरयूपार, दक्षिण कोसल तथा कर्नाटक शाखायें भारत के बड़े भू-भागों पर शासन कर रही थी। आज से एक हजार वर्ष पूर्व तक कलचुरि अपने चरमोत्कर्ष प थे। उनका इतिहास भारत के किसी भी अन्य समकालीन अथवा उत्तरवर्त्ती राजवंश के इतिहास से कम गौरवशाली नहीं है। हर समाज को उत्थान पतन के दौर से गुजरना पड़ता है। महान कलचुरियों को भी लगभग सैकड़ों वर्षों तक सत्ता में रहकर सत्ताच्युत होना पड़ा। जैसा कि अन्य पराजित समुदायों के साथ हुआ है। कलचुरियों का अधिकांश गौरवशाली इतिहास अंधकाराच्छादित हो गया। इस समाज के लोगों को न जाने कितने अत्याचार सहने पड़े और न जाने कहाँ-कहाँ भटकना पड़ा। व्यवसाय के नये साधनों की खोज शुरू हुई। इतिहास साक्षी है कि प्रायः सभी कलचुरी शासक शैव थे। शैवमत में कर्मकाण्डों के लिए मादक द्रव्यों का प्रयोग वर्जित नहीं रहा है। संभवतः उत्तम श्रेणी के मादक पदार्थों का पारखी होने तथा यत्र-तत्र आजीविका की तलाश में भटकने के कारण कलचुरियों ने मादक पदार्थों का व्यवसाय भी अपना लिया। इससे धन तो प्राप्त हुआ, किन्तु कहीं-कहीं प्रतिष्ठा ह्रास भी हुआ। अट्ठारहवीं शताब्दी के अंत तक सर्वाधिक सम्मानित समाज को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा।

सहस्त्रार्जुन की एक प्रमुख शाखा कब और कैसे कलचुरी कहलाई इस संबन्ध में आरंभिक साक्ष्य गौण है। छठी शताब्दी एवं उसके बाद के अभिलेखी साक्ष्यों से पता लगता है कि कलचुरी स्वयं को हैहयवंशियों के उत्तराधिकारी मानते हैं। चुंकि अधिकांश कलचुरी शासक शैव थे, इस कारण कुछ विद्वान भगवान शिव के नाम “कालचुर्य” से “कलचुरी” शब्द की उत्पत्ति मानते हैं।
अखिल भारतीय जायसवाल (सर्ववर्गीय) महासभा के संविधान में हमारे समाज की

परिभाषा हैहयवंशीय {कलचुरी, कलवार, कलाल,} समाज के सभी वर्गों के रूप में दी गई है। इस संगठन के इतिहास को तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है।

प्रथम चरण:- ई० सन् 1904 के बाद समाज का पुनर्जागरण काल आया। लाला हनुमान प्रसाद जी जायसवाल के प्रयास से प्रयाग में “सनातन धर्म कलवार सभा” की स्थापना की गई ई० सन् 1905 में बनारस में एक प्रान्तीय सम्मेलन बाबू दीपनारायण सिंह जी “बार एट लो” भागलपुर के सभापतित्व में हुआ। दूसरा सम्मेलन श्री अतरसिंहजी अहलुवालिया के सभापतित्व में भागलपुर में हुआ। जिसमें यह प्रस्ताव पारित हुआ कि सभी सजातीय बंधुओं को मिलाकर एक अखिल भारतीय सम्मेलन किया जाय। इन सम्मेलनों के प्रभाव से “कलवार महासभा” का गठन हुआ। 29-31 दिसम्बर को 1911 ई० में प्रयाग में महासभा का पहला अखिल भारतीय अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन के प्रथम सत्र की अध्यक्षता श्री कुन्दन लालजी जायसवाल, दिल्ली ने और दूसरे सत्र की अध्यक्षता श्री फूलचन्दजी, नीमच ने की थी। कुछ शिथिलता के बाद दूसरा अधिवेशन 4–6 फरवरी 1924 को प्रयाग में ही रायबहादुर गजाधर प्रसादजी जायसवाल, एडवोकेट होसंगाबाद की अध्यक्षता में हुआ। लोगों में काफी जोश-खरोश था। महासभा का संविधान बनाया गया तथा संगठन का विस्तार हुआ तीसरा अधिवेशन 24-26 दिसम्बर को 1925 में कानपुर में राजा देवकीनन्दन प्रसाद, मुंगेर की अध्यक्षता में हुआ। उस बीच समाज के वर्ण को लेकर दो विचारधाराओं का टकराव बढ़ गया। बहुत से लोग इतिहास के आधार पर प्रमाणित क्षत्रिय वर्ग के पक्षधर थे तो बहुत से समाज के अधिकतर लोगों के व्यवसाय में लिप्त रहने के कारण कार्य को प्रधान मानकर वैश्य वर्ण के पक्ष में थे। चौथा अधिवेशन 16-18 अप्रैल 1926 ई० को प्रसिद्ध इतिहासकार एवं विधिवेत्ता डॉ० काशी प्रसाद जी जायसवाल, बार एट लों, पटना की अध्यक्षता में जबलपुर में हुआ। इस अधिवेशन में निश्चय हुआ कि हमारी जाति क्षत्रिय है। अतः सभी सजातीय बन्धु अपनी जातीय “हैहय क्षत्रिय” ही लिखें। इस ऐतिहासिक अधिवेशन में सभा का नाम बदलकर “हैहय क्षत्रिय महासभा” रखा गया। इसके साथ ही वैश्य वर्ण के कई समर्थक वर्गों का समाज से दूर जाने का सिलसिला शुरू हो गया।

द्वितीय चरण:- पंचम अधवेशन “हैहय क्षत्रिय महासभा के नाम से दिसंबर 1927 में राजा रघुनन्दन प्रसाद सिंह, मुंगेर की अध्यक्षता में मिर्जापुर में हुआ था। छठा अधिवेशन अप्रैल 1930 में रायबहादुर हीरा लाल की अध्यक्षता में कलकत्ता में सातवाँ अधिवेशन मार्च 1932 डॉ० गोरख प्रसादजी की अध्यक्षता में भागलपुर में आठवाँ अधिवेशन जनवरी 1936 श्रीमती धर्मशीला जायसवाल की अध्यक्षता में प्रयाग में नौवाँ अधिवेशन मार्च 1937 श्री गुलाब चन्द चौधरी, छिं दवाड़ा की अध्यक्षता में पूर्णियाँ में दसवाँ अधिवेशन अप्रैल 1938 छिंदवाड़ा में तथा ग्यारहवाँ अधिवेशन दिसंबर 1944 उज्जैन में उस अधिवेशन में सरदार मोहन सिंहजी अहलुवालिया, “अखिल भारतीय हैहय क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष बने तथा जीवन पर्यन्त बने रहे। सरदार मोहनसिंहजी अहलुवालिया के निधन के उपरान्त उनके पुत्र सरदार दलजीत सिंह अहलुवालिया अध्यक्ष बनाये गए। महासभा के पदाधिकारियों में सामंजस्य का अभाव होने लगा। फलस्वरूप संगठन में शिथिलता आ गई। 17-18 जून 1978 को महासभा के कुछ उत्साही लोगों ने प्रयाग में एक अधिवेशन आयोजित किया। इस प्रकार महासभा दो भागों में विभाजित हो गया। समानान्तर महासभा के कारण शिथिलता आ गई फलस्वरूप संगठन कमजोर हो गया। “हैहय क्षत्रिय महासभा की निष्क्रियता से समाज में हताशा फैल गई। समाज को अखिल भारतीय स्तर पर संगठित करने की आवश्यकता सर्वत्र अनुभव की जा रही थी।

तृतीय चरणः 19-20 मई 1984 को दिल्ली में विशाल महासम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में देश भर से पधारे सभी वर्ग के हजारों बन्धुओं ने सर्वसम्मति से “अखिल भारतीय जायसवाल महासभा का गठन किया। इस अधिवेशन में श्री जीत जायसवाल अध्यक्ष, हैदराबाद एवं श्री बेदकुमार जायसवाल महासचिव, दिल्ली बने। 20-21 मई 1989 को बड़ौदरा में द्वितीय महासम्मेलन में श्री धीरज लाल जायसवाल, अध्यक्ष, बडौदरा एवं श्री बेदकुमार जायसवाल महासचिव बनें तृतीय महाधिवेशन 12-13 अप्रैल 1994 नागपुर में श्री बसंल लाल जायसवाल, अध्यक्ष, नागपुर एवं पुन: बेदकुमार जायसवाल महासचिव बने। चतुर्थ सम्मेलन 9-10 जनवरी 1999 इन्दौर में श्री बालेश्वर दयाल जायसवाल, अध्यक्ष, नागदा एवं श्री अशोक कुमार गुप्ता महासचिव, लखनऊ बनें, पंचम अधिवेशन 18-19 दिसंबर 2001 को डॉ० मदन प्रसाद जायसवाल, अध्यक्ष, बेतिया एवं श्री चन्द्र प्रकाश वर्मा, महासचिव, हैदराबाद बने। इस बीच 10 नवम्बर 1991 को उज्जैन में द्वितीय कार्यकारिणी समिति की बैठक में “अखिल भारतीय जायसवाल महासभा” के नाम में “सर्ववर्गीय शब्द जोड़ा गया, तदुपरांत समाज में सर्वत्र जागृति की लहर दिखायी दे रही है तथा सभी के मन में एक मंच पर आने और संगठित होकर आगे बढ़ने की भावना उत्पन्न हुई। वर्तमान में अखिल भारतीय जायसवाल सर्ववर्गीय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, राजकिशोर पापा मोदी जी , अम्बाजीगोई एवं राष्ट्रीय महामंत्री अधिवक्ता शैलेन्द्र जायसवाल जी दिल्ली हैं.
कुछ शंकाओं और पद एवं प्रतिष्ठा वश कलवार समाज का विभिन्न नामों से राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर पर समाज को संगठित करने हेतु अनेक संगठन कार्यरत हैं. सबका उद्देश्य समान है समाज को संगठित करना एवं सामाजिक तथा राजनितिक पहचान प्रतिस्थापित करना।

सामाजिक एवं राजनीतिक जागरण का परिणाम देश की संसद एवं विभिन्न प्रदेशों के विधान सभाओं में बढ़ते सदस्यों की संख्या तथा स्थानीय निकायों के चुनाव में बड़ी संख्या में निर्वाचित होकर आने वाले सदस्यों की संख्या हैं।
परन्तु विभिन्न संगठनों के नाम से विभाजित रहने के कारण किसी भी राजनितिक दल द्वारा संख्या अनुसार उचित सम्मान एवं महत्त्व नहीं प्रदान किया जाता है. मेरा आकलन है की कलवार-जायसवाल समाज के जितने भी प्रतिनिधि किसी भी राजनितिक दल या संस्था में सक्रिय हैं उन्हें प्रतिनिधित्व उनके व्यक्तिगत कार्क्षमता या कर्मठता के बल पर प्राप्त हो पाया है.
कलवार-जायसवाल समाज के जितने भी संगठन सक्रिय रूप से कार्यरत हैं वे सभी यदि आपस में समनव्य स्थापित करें तब उन्हें समाज एवं राजनीति में समुचित सम्मान तथा प्रतिनिधित्व मिलना सुनिश्चित है.
                                         संघे शक्ति कलौयुगे

संकलन: अशोक कुमार चौधरी

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