कटिहार : अंगदेश की ऐतिहासिक धरोहर से आधुनिक जिला तक

📜 महाभारतकालीन अंगदेश और कर्ण
भारत के इतिहास में अंगदेश (वर्तमान बिहार का भागलपुर, मुंगेर, पूर्णिया और कटिहार क्षेत्र) का विशेष स्थान है। महाभारत में अंगराज कर्ण का राज्य अंगदेश ही था, जिसकी राजधानी चंपापुरी (आज का भागलपुर) थी। कर्ण केवल युद्ध–वीर ही नहीं, बल्कि दानवीरता के प्रतीक भी माने जाते हैं। दानवीर कर्ण की कथाएँ अंगदेश की सांस्कृतिक चेतना में आज भी जीवित हैं। कटिहार चूँकि अंग प्रदेश की उत्तरी सीमा पर स्थित रहा, इसलिए इसे अंगदेश की सांस्कृतिक विरासत का उत्तराधिकारी माना जा सकता है।
🌊 गंगा–कोसी त्रिमुहानी और मनिहारी की दंतकथा
कटिहार के कुर्सैला के समीप गंगा और कोसी का संगम—त्रिमुहानी—प्राचीन काल से ही धार्मिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। लोककथाओं में इसे पुण्यसंगम कहा गया है, जहाँ माघ और कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान विशेष फलदायी माना जाता है। मनिहारी स्थल का उल्लेख भी पौराणिक गाथाओं में मिलता है—यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के प्रवास और मणि खोने की कथा प्रसिद्ध है। इसीलिए इसे मनिहारी कहा गया। नदी–तटों पर बसे काढ़ा गोला जैसे व्यापारिक केंद्रों ने इस भूभाग को प्राचीनकाल से ही व्यापार का सेतु बनाया।
🛕 धार्मिक स्थल और सिख गुरुओं का प्रवास
कटिहार धार्मिक–सांस्कृतिक दृष्टि से बहुस्तरीय है। लक्ष्मीपुर गुरुद्वारा (बरारी प्रखंड) : मान्यता है कि गुरु तेगबहादुर साहिब 1670 में असम यात्रा से लौटते हुए यहाँ ठहरे थे। यहाँ आज भी गुरुग्रंथ साहिब की प्राचीन प्रति सुरक्षित है। गोरखनाथ धाम और माघ मेला : गोरखनाथ मंदिर तथा संगम तट पर माघ मास में आयोजित मेले स्थानीय संस्कृति का हिस्सा हैं। मनिहारी घाट : पौराणिक गाथाओं और गंगा–कोसी संगम की पवित्रता से जुड़ा तीर्थ स्थल है।
🕌 मुगल, सिराजुद्दौला और अंग्रेजों का प्रभाव
मध्यकाल में यह क्षेत्र सरकार ताजपुर और सरकार पूर्णिया के अधीन था। बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के शासन (1756–57) में यह इलाका बंगाल नवाबशाही के अधीन रहा। प्लासी (1757) की हार के बाद अंग्रेजों ने इस भूभाग पर नियंत्रण स्थापित किया। 1770 में पूर्णिया को जिला बनाया गया, जिसमें कटिहार सम्मिलित रहा। अंग्रेजों ने यहाँ कोठियाँ और प्रशासनिक केंद्र बनाए। 19वीं शताब्दी में जूट उद्योग और रेलवे के विकास में कटिहार एक प्रमुख केंद्र बना।
🏰 जमींदारी और राजस्व इतिहास
अंग्रेजों के राजस्व ढाँचे में कटिहार–पूर्णिया क्षेत्र जमींदारी प्रथा का केंद्र बना। चौधरी परिवार और अन्य स्थानीय जमींदार बड़े भूभाग के स्वामी रहे। कुर्सैला एस्टेट, राजा अयोध्या प्रसाद सिंह द्वारा स्थापित, इस क्षेत्र की आर्थिक–सामाजिक संरचना में प्रभावी रहा। यहाँ की जमींदारी और कृषक–संरचना ने स्थानीय समाज की परंपराएँ भी आकार दीं।
🇮🇳 कटिहार जिला की स्थापना
स्वतंत्र भारत में प्रशासनिक सुगमता के लिए 2 अक्टूबर 1973 को कटिहार को पूर्णिया से अलग कर अलग जिला का दर्जा दिया गया। आज यह उत्तर–पूर्व भारत का प्रवेश द्वार और बिहार का प्रमुख जूट, व्यापार और रेलवे केंद्र है।
🗣️ भाषा और संस्कृति
कटिहार की सांस्कृतिक विशेषता इसकी बहुभाषिकता है। हिंदी और उर्दू आधिकारिक भाषा हैं। दैनिक जीवन में अंगिका, मैथिली, भोजपुरी, संथाली और बांग्ला का भी प्रयोग होता है। संस्कृति कृषि–प्रधान और धार्मिक–आध्यात्मिक है। छठ पूजा, दुर्गा पूजा, ईद, मुहर्रम, संथाली नृत्य, अंगिका लोकगीत, झूमर, जट–जटिन यहाँ के लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।
🌟 निष्कर्ष
कटिहार का इतिहास महाभारतकालीन अंगदेश और कर्ण की स्मृति से जुड़ा है। चंपापुरी (भागलपुर) की अंग राजधानी से लेकर मुगल–नवाब–अंग्रेज शासन तक यह भूभाग निरंतर महत्वपूर्ण रहा है। गंगा–कोसी का त्रिमुहानी संगम, मनिहारी की दंतकथा, लक्ष्मीपुर गुरुद्वारा, गोरखनाथ धाम और जमींदारी–एस्टेट इसकी विविध धार्मिक और ऐतिहासिक परतों को उजागर करते हैं। 2 अक्टूबर 1973 को जिला बनने के बाद कटिहार अंगदेश की गौरवगाथा को आधुनिक प्रशासनिक पहचान में परिणत करता है। आज आवश्यकता है कि त्रिमुहानी और लक्ष्मीपुर गुरुद्वारा को पर्यटन–सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाए, ताकि यह जिला अपने इतिहास और संस्कृति की धरोहर को विश्व पटल पर ला सके।
✒️ शोध लेखक
© अशोक कुमार चौधरी प्रियदर्शी
सेवानिवृत्त वरिष्ठ बैंक अधिकारी
ज्योतिष–हस्तरेख एवं समसामयिक विषय लेखक, विचारक, सामाजिक चिंतक
पता – कटिहार, बिहार
मोबाइल – 9431229143
Email – kautilya.sstro@gmail.com
📌 कॉपीराइट *© अशोक कुमार चौधरी प्रियदर्शी.* इस लेख की विषयवस्तु परंपरागत स्रोतों, बुकानन–गजेटियर, जिला गजेटियर और स्थानीय लोकश्रुतियों पर आधारित है। लेख के किसी भी हिस्से का पुनःप्रकाशन लेखक की अनुमति के बिना वर्जित है। तथ्यों का उपयोग केवल शैक्षणिक एवं शोध उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
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