सेकुलर की नजर में भारत पिछड़ा है ? अशोक चौधरी

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जो बायडेन और कमला हैरिस के शपथग्रहण समारोह को देख रहे लोगों को पता चल रहा होगा कि अमेरिकी सरकार में ईसाई मजहब और बाइबिल का कितना महत्व है। वो लोग चर्च में प्राथनाएँ करते हैं, बाइबिल पर शपथ लेते हैं और उसके वाक्य दोहराते हैं। बड़ा ‘कूल’ है न ये सब। बड़ा ही ‘Awwww’ मोमेंट होता है न ये यहाँ की यंग जेन की भाषा में कहें तो ? अमेरिका में कॉन्ग्रेस के सारे सदस्य चर्च में जाते हैं, साथ प्रार्थना करते हैं। कितना सुंदर लग रहा है न ये सब ? चर्च, प्रेयर, फादर, क्रिसमस, कैथेड्रल, अपोस्टल – फ़किंग सो कूल वर्ड्स ना यार.. कितना अत्याधुनिक माहौल है।

भारत में ? यहाँ 500 वर्ष पूर्व भगवान राम के जन्मस्थल को तोड़ कर किसी ने मस्जिद बना दिया और सदियों चली न्यायिक प्रक्रिया से हिंदुओं ने उसे वापस पाया तो ये ‘Saffron Terror’ हो जाता है। यार कितने पुराने खयालात वाले होते हैं न ये लोग, जो अब तक मंदिर पर अटके हुए हैं। कैसा विकास विरोधी प्रधानमंत्री है, जो काशी विश्वनाथ में अभिषेक करता है और अयोध्या में भूमिपूजन करता है। कैसी ‘Stone Age’ वाली फीलिंग आ रही है.. छी-छी.. और योगी के खिलाफ इंस्टाग्राम पर लिखना तो बड़ा ही ‘कूल’ है.. कपड़े तो देखो ये भी कोई पहनावा है ?

अमेरिका में अब तक कोई बायडेन को पुराने खयालात वाला क्यों नहीं बोल रहा ? वहाँ के युवक-युवतियाँ क्यों नहीं ऐसा बोल रहे कि बाइबिल के वाक्य ऐसे बड़े मौकों पर दोहराने से सेकुलरिज्म खतरे में आ जाएगा ? वहाँ के मानवाधिकार संगठन क्यों नहीं हल्ला मचा रहे कि राष्ट्रपति चर्च जाएगा तो बाकी मजहब के लोगों में कैसी असुरक्षा की भावना आ जाएगी ? वहाँ की मीडिया इसका विश्लेषण क्यों नहीं कर रही कि शपथग्रहण समारोह में पादरियों की उपस्थिति डराने वाली है। वहाँ के फेमिनिस्ट्स Patriarchy की बातें क्यों नहीं कर रहे ? बडा अजीब हैं न।

हजारों वर्षों से यूँ ही चली आ रही वैज्ञानिक सनातन पद्धति कूल नहीं है और ऐसे मजहब जिनका विज्ञान से कोई नाता तक नहीं वो बड़े रोचक कैसे लगते हैं ? इसका कारण है हीन भावना या Inferiority Complex.. भारत में ब्रिटिश काल में क्रिसमस ‘साहब लोगों’ का त्योहार था, इसीलिए ‘बड़ा दिन’ हो गया। एक स्टेटस बन गया क्योंकि सबको ‘साहब लोगों’ जैसा बनना था। सबको क्रिसमस ट्री जलानी थे। तुलसी, नीम और पीपल उतना ‘कूल’ नहीं है। क्रिसमस ट्री तो पूरा का पूरा आयुर्वेद पर आधारित है। उसकी पत्तियाँ और बल्ब चबा जाइए, सीधा येशु से मुलाकात होगी।

बड़ी-बड़ी तस्वीरें शेयर कर रहे थे न लिबरल गिरोह के लोग कि फलाँ देश में कोरोना से लड़ने के लिए चिलाँ हो रहा है और भारत में ताली-थाली बजाई जा रही है। फलाँ देश में चिलाँ PM ने अंग्रेजी में बड़ी अच्छी बात बोल दी और हमारा प्रधानमंत्री दीये जला/जलवा रहा है। फलाँ देश में अस्पताल बने हैं, हमारा देश मंदिरों पर ही अटका हुआ है। चिलाँ देश ने स्कूल बनाए, हम मंदिर पर अटके हैं। क्या हुआ अब ? अत्याधुनिक अमेरिका में 4 लाख लोग मर गए, जबकि जनसंख्या भारत की 4 गुना से भी अधिक है। अमेरिका ने कितने मंदिर बनवाए थे भाई ? वहाँ किसने थाली बजाई ?

आज भारत ने दीये जला कर और थाली बजा कर ही दो-दो वैक्सीन बना ली है। इतना ही नहीं, भूटान और मालदीव्स को 2.5 लाख डोज भेज भी दिए गए, वो भी मुफ्त में। 10 देशों के आवेदन आ गए हैं। पड़ोसियों को पहले दिया जाएगा। कुल मिला कर 1 करोड़ डोज बाँटे जाने हैं। ये मानवता नहीं है ? किसी छिपकली की कटी हुई पूँछ को सहला देना और उसे इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर के लाइक बटोरना ही मानवता है ?
कहाँ गए अब विरोध करने वाले ? भारत आज दुनिया की जान बचा रह है, जहाँ स्कूल-अस्पताल हैं वहाँ भी वैक्सीन की सप्लाई हो रही है।

आज एक बार फिर से याद दिला दूँ, भारत मे कोरोना के मात्र हजार मामले बचे हैं। इनमें से आधे कहाँ हैं पता है ? केरल में। वही ‘केरला मॉडल’, जो फ्लॉप हो गया है। बड़े-बड़े पोस्ट आ रहे थे कि केरला ने कैसे कोरोना को निपटा दिया। अब ? कहाँ गया मॉडल ? वहाँ के सीएम तो सोना तस्करी और दुबई से फंडिंग में फँसे हैं। केरला के बाद सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में हैं, जहाँ भाजपा की सत्ता नहीं। सबसे अच्छा प्रबंधन उत्तर-प्रदेश में हुआ, जबकि जनसंख्या सबसे ज्यादा है। इससे क्या मतलब निकालें ? मंदिर का नाम रटना बन्द करो और अपनी संस्कृति-इतिहास को पहचानो।

ये तीन बातें जो मिले सबको याद दिलाइए। आप सब पोस्ट कीजिए। पहली, ताली/थाली बजाने और दीये जलाने वाले देश ने मंदिर बनाने वाली सरकार के अंतर्गत दो-दो वैक्सीन बना कर दुनिया को कैसे दे दिया ?
दूसरी, केरला मॉडल का क्या हाल है ?
अमेरिका ने स्कूल – अस्पताल बनवाए और मंदिर नहीं, फिर भी सबसे ज्यादा लोग कैसे मरे ?

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