*राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक आयोग की स्थापना: संवैधानिक दायित्व, सामाजिक न्याय और गरिमामय वृद्धावस्था की दिशा में एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय संकल्प*
*©आचार्य अशोक चौधरी प्रियदर्शी* कटिहार बिहार
भारतीय सभ्यता की आत्मा में यदि किसी मूल्य को सबसे अधिक प्रतिष्ठा मिली है तो वह है—वृद्धजनों का सम्मान। हमारे पारंपरिक जीवन में आयु केवल जैविक अवस्था नहीं थी; वह अनुभव, धैर्य, नैतिक संतुलन और सामाजिक मार्गदर्शन का प्रतीक थी। परिवार व्यवस्था में वरिष्ठजन निर्णय के केंद्र में रहते थे। वे केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि परंपरा के संरक्षक, संस्कृति के संवाहक और जीवन‑मूल्यों के शिक्षक थे। किंतु समय की गति ने सामाजिक संरचना को गहराई से परिवर्तित कर दिया है। औद्योगीकरण, शहरीकरण, वैश्वीकरण, रोजगार हेतु प्रवासन, परमाणु परिवार प्रणाली और डिजिटल जीवनशैली ने पारंपरिक सामुदायिक ढाँचे को कमजोर किया है। इस परिवर्तन का सबसे गहरा प्रभाव जिस वर्ग पर पड़ा है, वह है—वरिष्ठ नागरिक।
आज वृद्धावस्था केवल जीवन का स्वाभाविक चरण नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति, सामाजिक संरचना, आर्थिक सुरक्षा और संवैधानिक उत्तरदायित्व का विषय बन चुकी है। भारत जनसंख्या संक्रमण के उस चरण में प्रवेश कर चुका है जहाँ युवा शक्ति उसकी आर्थिक ऊर्जा का आधार है, परंतु साथ ही वृद्धजन आबादी भी तीव्र गति से बढ़ रही है। औसत जीवन प्रत्याशा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और शिशु मृत्यु दर में कमी ने जनसंख्या संरचना को परिवर्तित किया है। आने वाले दो दशकों में 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या करोड़ों में होगी। यह परिवर्तन केवल सांख्यिकीय नहीं, बल्कि नीति‑निर्धारण, आर्थिक नियोजन, स्वास्थ्य अवसंरचना और सामाजिक सुरक्षा ढाँचे के लिए निर्णायक है।
यदि इस बढ़ती हुई वृद्धजन आबादी की आवश्यकताओं को समुचित रूप से संबोधित नहीं किया गया, तो सामाजिक असंतुलन और मानवीय संकट उत्पन्न हो सकता है। वृद्धावस्था में आर्थिक निर्भरता, स्वास्थ्य असुरक्षा, मानसिक अवसाद, सामाजिक उपेक्षा और कानूनी जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समन्वित, अधिकार‑संपन्न और जवाबदेह संस्था की स्थापना समय की माँग है—राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक आयोग।
संविधान के मूल सिद्धांत इस विषय को केवल कल्याणकारी योजना का प्रश्न नहीं रहने देते, बल्कि इसे अधिकार और दायित्व के स्तर पर स्थापित करते हैं। अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को संरक्षित करता है। अनुच्छेद 38 राज्य को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय स्थापित करने का निर्देश देता है। अनुच्छेद 41 विशेष रूप से वृद्धावस्था, बेरोजगारी और विकलांगता की स्थिति में सार्वजनिक सहायता प्रदान करने की बात करता है। अनुच्छेद 46 समाज के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा पर बल देता है। इन संवैधानिक प्रावधानों का समेकित अर्थ यह है कि वृद्धजनों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना राज्य का नैतिक ही नहीं, विधिक दायित्व भी है।
वर्तमान परिदृश्य में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा वृद्धावस्था पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, भरण‑पोषण अधिनियम, वरिष्ठ नागरिक पहचान पत्र, रेल एवं हवाई यात्रा में रियायतें, हेल्पलाइन सेवाएँ आदि संचालित हैं। किंतु इन योजनाओं का संचालन विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के अधीन बिखरा हुआ है। समन्वय की कमी, संसाधनों की सीमितता और निगरानी तंत्र की शिथिलता के कारण इनका प्रभाव अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँचता। एक राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक आयोग इन योजनाओं को समेकित दृष्टि प्रदान कर सकता है।
आर्थिक सुरक्षा वृद्धावस्था की गरिमा का आधार है। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत करोड़ों श्रमिकों के पास सेवानिवृत्ति के बाद नियमित आय का स्रोत नहीं होता। सामाजिक मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि आर्थिक निर्भरता वृद्धावस्था में आत्मसम्मान को गहराई से प्रभावित करती है। आय का स्थायी स्रोत न होने पर व्यक्ति स्वयं को परिवार पर बोझ समझने लगता है, जिससे अवसाद, चिंता और सामाजिक अलगाव की भावना उत्पन्न होती है। राष्ट्रीय आयोग न्यूनतम पेंशन मानक निर्धारित करने, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण की पारदर्शिता सुनिश्चित करने और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के मूल्यांकन की व्यवस्था कर सकता है।
स्वास्थ्य सुरक्षा वृद्धजनों के लिए जीवनरेखा के समान है। दीर्घकालिक रोग, हृदय समस्याएँ, मधुमेह, गठिया, दृष्टि और श्रवण संबंधी कठिनाइयाँ वृद्धावस्था में सामान्य हो जाती हैं। मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विश्व स्तर पर किए गए अध्ययन बताते हैं कि अकेलापन और सामाजिक उपेक्षा वृद्धजनों में अवसाद और संज्ञानात्मक क्षरण को बढ़ाते हैं। भारत में जेरियाट्रिक विशेषज्ञों की संख्या सीमित है। जिला अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में वृद्धजन अनुकूल सुविधाओं का अभाव है। आयोग जिला स्तर पर जेरियाट्रिक वार्ड, मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयाँ, मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र और सस्ती बीमा योजनाओं के विस्तार का खाका तैयार कर सकता है।
सामाजिक संरचना में परिवर्तन ने वृद्धजन उत्पीड़न की घटनाओं को भी जन्म दिया है। संपत्ति विवाद, आर्थिक शोषण, भावनात्मक उपेक्षा और कभी‑कभी शारीरिक हिंसा भी सामने आती है। भरण‑पोषण संबंधी कानून मौजूद हैं, परंतु उनका क्रियान्वयन प्रभावी नहीं है। आयोग त्वरित शिकायत निवारण प्रकोष्ठ, कानूनी सहायता केंद्र और पुलिस‑प्रशासन के लिए संवेदनशीलता प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित कर सकता है।
डिजिटल युग में एक नई चुनौती सामने आई है—डिजिटल बहिष्करण। बैंकिंग, पेंशन वितरण, स्वास्थ्य परामर्श और सरकारी सेवाएँ ऑनलाइन हो रही हैं। अनेक वरिष्ठ नागरिक डिजिटल उपकरणों के प्रयोग में असहज हैं। साइबर ठगी विशेष रूप से वृद्धजनों को निशाना बनाती है। सामाजिक‑मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि तकनीकी असुरक्षा आत्मविश्वास को कम करती है और सामाजिक भागीदारी को सीमित करती है। आयोग डिजिटल साक्षरता अभियान, सरल इंटरफेस आधारित सेवाएँ और साइबर सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम को प्राथमिकता दे सकता है।
महिला वरिष्ठ नागरिकों की स्थिति और भी संवेदनशील है। विधवा पेंशन की अपर्याप्तता, संपत्ति अधिकारों में जटिलता और आर्थिक निर्भरता उन्हें दोहरी उपेक्षा का सामना कराती है। लैंगिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि वृद्ध महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर अधिक चुनौतियाँ झेलनी पड़ती हैं। आयोग महिला वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष सुरक्षा प्रावधानों और योजनाओं की अनुशंसा कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से भी शिक्षा ली जा सकती है। जापान ने दीर्घकालिक देखभाल बीमा प्रणाली विकसित की है। जर्मनी और फ्रांस में सामाजिक सुरक्षा तंत्र सुदृढ़ है। इन देशों ने वृद्धावस्था को नीति‑निर्माण का केंद्रीय विषय बनाया है। भारत अपनी सांस्कृतिक परंपरा और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप ऐसा मॉडल विकसित कर सकता है जहाँ परिवार, समुदाय और राज्य की साझा जिम्मेदारी हो।
सक्रिय वृद्धावस्था की अवधारणा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। सामाजिक मनोविज्ञान में यह स्थापित तथ्य है कि उद्देश्यपूर्ण जीवन और सामाजिक सहभागिता मानसिक संतुलन बनाए रखते हैं। सेवानिवृत्त शिक्षक, चिकित्सक, अभियंता, बैंक अधिकारी और प्रशासक अपने अनुभव का उपयोग समाज के हित में कर सकते हैं। आयोग ज्ञान‑साझाकरण मंच, मेंटरशिप कार्यक्रम, परामर्श परिषद और स्वैच्छिक सेवा नेटवर्क विकसित कर सकता है। इससे वरिष्ठ नागरिक स्वयं को उपयोगी और सम्मानित अनुभव करेंगे।
संरचनात्मक दृष्टि से आयोग को अनुसंधान प्रकोष्ठ, डेटा विश्लेषण इकाई और राज्य स्तरीय आयोगों के साथ समन्वित तंत्र से सुसज्जित किया जाना चाहिए। वार्षिक रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत की जाए और अनुशंसाओं पर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशासनिक अधिकार अनिवार्य हैं।
2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य तभी सार्थक होगा जब विकास समावेशी हो। वृद्धजनों की सुरक्षा, सम्मान और सहभागिता सुनिश्चित किए बिना विकास अधूरा रहेगा। विकास का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना है।
राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक आयोग की स्थापना केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व की पूर्ति और सामाजिक चेतना का प्रतीक होगी। यह पहल भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में स्थापित करेगी जो आर्थिक प्रगति के साथ मानवीय मूल्यों को समान महत्व देता है। वृद्धावस्था प्रत्येक नागरिक का संभावित भविष्य है; अतः वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
जब भारत स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर होगा, तब उसकी पहचान केवल आर्थिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि इस बात से भी होगी कि उसने अपने वरिष्ठ नागरिकों को कितनी सुरक्षा, गरिमा और सम्मान प्रदान किया। राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक आयोग उसी दिशा में एक दूरदर्शी, न्यायसंगत और ऐतिहासिक पहल सिद्ध हो सकता है।
लेखक परिचय:
सेवानिवृत्त वरिष्ठ बैंक अधिकारी वरिष्ठ कार्यकर्ता बीएमएस समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र शोध लेखक समीक्षक विचारक सामाजिक चिंतक।