रवींद्रनाथ टैगोर का जीवनी
अशोक कुमार चौधरी

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का जन्‍म 7 मई सन् 1861 को कोलकाता में हुआ था। रवींद्रनाथ टैगोर एक कवि, उपन्‍यासकार, नाटककार, चित्रकार, और दार्शनिक थे। रवींद्रनाथ टैगोर एशिया के प्रथम व्‍यक्ति थे, जिन्‍हें नोबल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था।

वे अपने माता-पिता की तेरहवीं संतान थे। बचपन में उन्‍हें प्‍यार से ‘रबी’ बुलाया जाता था। आठ वर्ष की उम्र में उन्‍होंने अपनी पहली कविता लिखी, सोलह साल की उम्र में उन्‍होंने कहानियां और नाटक लिखना प्रारंभ कर दिया था।

अपने जीवन में उन्‍होंने एक हजार कविताएं, आठ उपन्‍यास, आठ कहानी संग्रह और विभिन्‍न विषयों पर अनेक लेख लिखे। इतना ही नहीं रवींद्रनाथ टैगोर संगीतप्रेमी थे और उन्‍होंने अपने जीवन में 2000 से अधिक गीतों की रचना की। उनके लिखे दो गीत आज भारत और बांग्‍लादेश के राष्‍ट्रगान हैं।

जीवन के 51 वर्षों तक उनकी सारी उप‍लब्धियां और सफलताएं केवल कोलकाता और उसके आसपास के क्षेत्र तक ही सीमित रही। 51 वर्ष की उम्र में वे अपने बेटे के साथ इंग्‍लैंड जा रहे थे। समुद्री मार्ग से भारत से इंग्‍लैंड जाते समय उन्‍होंने अपने कविता संग्रह गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद करना प्रारंभ किया। गीतांजलि का अनुवाद करने के पीछे उनका कोई उद्देश्‍य नहीं था केवल समय काटने के लिए कुछ करने की गरज से उन्‍होंने गीतांजलि का अनुवाद करना प्रारंभ किया। उन्‍होंने एक नोटबुक में अपने हाथ से गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद किया।


टैगोर के अनुसार शिक्षा का अर्थ:
टैगोर ने शिक्षा का व्यापक अर्थ लगाया है। उन्होंने शिक्षा का अर्थ-सृष्टि के साथ सामंजस्य स्थापित करना बताया है। उन्होंने अपनी पुस्तक परसौनेलिटी में लिखा हैं-   सर्वोच्च शिक्षा वही है जो सम्पूर्ण दृष्टि से हमारे जीवन का सामंजस्य स्थापित करती है। सम्पूर्ण सृष्टि से तात्पर्य संसार की जीव और निर्जीव सभी वस्तुओं से है। इन वस्तुओं के साथ सामंजस्य करने के लिए मनुष्य की सभी स्थित शक्तियों का पूर्ण विकास होना चाहिए। इस स्थिति को टैगोर ने पूर्ण मनुष्यत्व कहा है। इस स्थिति में मनुष्य का शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास पूर्ण होना चाहिए। टैगोर के अनुसार मनुष्य को अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान का संग्रह करना चाहिए और उसके उपयोगी अंग को प्रयोग करना चाहिए। टैगोर के अनुसार, “सच्ची शिक्षा संग्रह किये गये लाभप्रद ज्ञान के प्रत्येक अंग के प्रयोग करने में उस अंग के वास्तविक स्वरूप को जानने में और जीवन में जीवन के लिए सच्चे आश्रय का निर्माण करने में निहित है।” शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Education)टैगोर ने शिक्षा के उद्देश्य किसी पुस्तक में प्रस्तुत नहीं किये हैं। उनके विचार उनके व्याख्यानों, लेखों तथा अन्य साहित्यिक रचनाओं से प्रकट हुए हैं। उनके विचार से शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

1. शारीरिक विकास – टैगोर के अनुसार बालकों का शारीरिक विकास किया जाना चाहिए। इसके लिए उन्हें प्राकृतिक वातावरण में रखना चाहिए। उसके शरीर के विभिन्न अंगों तथा इन्द्रियों का प्रशिक्षण होना चाहिए।

2. मानसिक विकास- टैगोर के अनुसार मानसिक विकास करने के लिए बालक को उसके जीवन की वास्तविक बातों से परिचित कराना चाहिए। उसको विभिन्न परिस्थितियों तथा वातावरणों का ज्ञान देना चाहिए जिससे वह उनके साथ सामंजस्य कर सकें।

3. संवेगात्मक विकास- टैगोर बालक के शारीरिक और मानसिक विकास के साथ ही साथ उसका संवेगात्मक विकास भी चाहते हैं। इसके लिए वे बालकों को कविता, संगीत, चित्रकला, नृत्य आदि की शिक्षा देने को कहते हैं।

4. नैतिक और आध्यात्मिक विकास- बालक के नैतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए बालकों को धैर्य, शान्ति, आत्म अनुशासन, आन्तरिक स्वतन्त्रता और आन्तरिक ज्ञान के मूल्यों से परिचित कराना चाहिए।

5. सामाजिक विकास- टैगोर के अनुसार बालकों का वैयक्तिक विकास करने के अतिरिक्त उनका सामाजिक विकास भी किया जाना चाहिए। इसके लिए बालकों से समाज सेवा करानी चाहिए।

टैगोर ने इन सिद्धान्तों पर आधारित जिन शिक्षण विधियों का समर्थन किया है उनमें से अधोलिखित प्रमुख हैं- 1. क्रियाविधि, 2. भ्रमण विधि, 3. वाद-विवाद, 4. प्रश्नोत्तर विधि ।

शिक्षक का स्थान:
टैगोर ने शिक्षण में शिक्षक को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। वह शिक्षण विधियों से अधिक महत्त्व शिक्षक को देते हैं। उन्होंने कहा है- “शिक्षा केवल शिक्षक के द्वारा दी जा सकती है शिक्षण विधि के द्वारा कदापि नहीं दी जा सकती है। मनुष्य केवल मनुष्य से ही सीख सकता है।” टैगोर अध्यापक से आशा करता है कि वह बालकों के साथ प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करे। उसे बाल मनोविज्ञान का ज्ञान होना चाहिए। अध्यापक को अपना आचरण आदर्शपूर्ण रखना चाहिए जिससे छात्र उसका अनुकरण कर सकें। उसे विद्यालय में ऐसा वातावरण प्रस्तुत करना चाहिए जिससे बालकों का पूर्ण विकास हो सके।

अनुशासन (Discipline)
टैगोर बाह्य अनुशासन में विश्वास नहीं करते हैं। वे स्वाभाविक अनुशासन पर बल देते हैं। स्वाभाविक अनुशासन को आत्मानुशासन या आन्तरिक अनुशासन भी कहते हैं। स्वाभाविक अनुशासन का अर्थ स्पष्ट करते हुए टैगोर ने लिखा है- “स्वाभाविक अनुशासन का अर्थ अपरिपक्व स्वाभाविक आवेगों की समुचित उत्तेजना और अनुचित दिशाओं में विकास से सुरक्षा है। स्वाभाविक अनुशासन की स्थिति में रहना छोटे बच्चों के लिए सुखदायक है। यह उनके पूर्ण विकास में सहायक होता है।”

लंदन में जहाज से उतरते समय उनका पुत्र उस सूटकेस को ही भूल गया जिसमें वह नोटबुक रखी थी। इस ऐतिहासिक कृति की नियति में किसी बंद सूटकेस में लुप्‍त होना नहीं लिखा था। वह सूटकेस जिस व्‍यक्ति को मिला उसने स्‍वयं उस सूटकेस को रवींद्रनाथ टैगोर तक अगले ही दिन पहुंचा दिया।

लंदन में टैगोर के अंग्रेज मित्र चित्रकार रोथेंस्टिन को जब यह पता चला कि गीतांजलि को स्‍वयं रवींद्रनाथ टैगोर ने अनुवादित किया है तो उन्‍होंने उसे पढ़ने की इच्‍छा जाहिर की। गीतांजलि पढ़ने के बाद रोथेंस्टिन उस पर मुग्‍ध हो गए। उन्‍होंने अपने मित्र डब्‍ल्‍यू.बी. यीट्स को गीतांजलि के बारे में बताया और वहीं नोटबुक उन्‍हें भी पढ़ने के लिए दी। इसके बाद जो हुआ वह इतिहास है। यीट्‍स ने स्‍वयं गीतांजलि के अंग्रेजी के मूल संस्‍करण का प्रस्‍तावना लिखा। सितंबर सन् 1912 में गीतांजलि के अंग्रेजी अनुवाद की कुछ सीमित प्रतियां इंडिया सोसायटी के सहयोग से प्रकाशित की गई।

लंदन के साहित्यिक गलियारों में इस किताब की खूब सराहना हुई। जल्‍द ही गीतांजलि के शब्‍द माधुर्य ने संपूर्ण विश्‍व को सम्‍मोहित कर लिया। पहली बार भारतीय मनीषा की झलक पश्चिमी जगत ने देखी। गीतांजलि के प्रकाशित होने के एक साल बाद सन् 1913 में रवींद्रनाथ टैगोर को नोबल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया। टैगोर सिर्फ महान रचनाधर्मी ही नहीं थे, बल्कि वो पहले ऐसे इंसान थे जिन्होंने पूर्वी और पश्चिमी दुनिया के मध्‍य सेतु बनने का कार्य किया था। टैगोर केवल भारत के ही नहीं समूचे विश्‍व के साहित्‍य, कला और संगीत के एक महान प्रकाश स्‍तंभ हैं, जो स्‍तंभ अनंतकाल तक प्रकाशमान रहेगा।

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