MSP यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस या फिर न्यूनतम सर्मथन मूल्य होता है. MSP सरकार की तरफ से किसानों की अनाज वाली कुछ फसलों के दाम की गारंटी होती है. राशन सिस्टम के तहत जरूरतमंद लोगों को अनाज मुहैया कराने के लिए इस एमएसपी पर सरकार किसानों से उनकी फसल खरीदती है.

बाजार में उस फसल के रेट भले ही कितने ही कम क्यों न हो, सरकार उसे तय एमएसपी पर ही खरीदेगी. इससे यह फायदा होता है कि किसानों को अपनी फसल की एक तय कीमत के बारे में पता चल जाता है कि उसकी फसल के दाम कितने चल रहे हैं. हालांकि मंडी में उसी फसल के दाम ऊपर या नीचे हो सकते हैं. यह किसान की इच्छा पर निर्भर है कि वह फसल को सरकार को बेचे एमएसपी पर बेचे या फिर व्यापारी को आपसी सहमति से तय कीमत पर.

कौन तय करता है MSP

फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य CACP यानी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग तय करता है. CACP तकरीबन सभी फसलों के लिए दाम तय करता है. हालांकि, गन्ने का समर्थन मूल्य गन्ना आयोग तय करता है. आयोग समय के साथ खेती की लागत के आधार पर फसलों की कम से कम कीमत तय करके अपने सुझाव सरकार के पास भेजता है. सरकार इन सुझाव पर स्टडी करने के बाद एमएसपी की घोषणा करती है.

किन फसलों का तय होता है एमएसपी

रबी और खरीफ की कुछ अनाज वाली फसलों के लिए एमएसपी तय किया जाता है. एमएसपी का गणना हर साल सीजन की फसल आने से पहले तय की जाती है. आज किसान बिल आने के बाद शोर मचाया जा रहा है कि किसानों के साथ अन्याय हो रहा है लेकिन 1969 के बाद से ही एमएसपी और प्रोक्योरमेंट को एक ही मिला दिया गया. जिसके चलते हुआ है कि बुआई से पहले और कटाई के बाद जो फसल उगाने का खर्च बढ़ा उसके बारे में किसी ने सोचा ही नहीं न पुरानी सरकार ने न ही मौजूदा सरकार ने.

दरअसल मंडी के बाहर एमएसपी की व्यवस्था का न होना ही सबसे बड़ा विवाद का का कारण है. सरकार ने जो तीन बिल पास किए हैं उन तीनों क़ानूनों से कोई बड़ी समस्या नहीं है लेकिन इसमें मंडी के बराबर कोई दूसरी व्यवस्था बनाने का प्रावधान नहीं किया गया है. यह असल समस्या की जड़ है. अगर कोई ‘प्राइवेट प्लेयर’ इस क्षेत्र में उतर रहा है तो उसके लिए भी एमएसपी की व्यवस्था होनी चाहिए. मान लिजिए किसी किसान ने अगर गेहूं के लिए 1950 रुपये प्रति क्विंटल की व्यवस्था मंडी के लिए की जाए तो वही व्यवस्था निजी कंपनियों के लिए भी होनी चाहिए.

केंद्र में जब मोदी सरकार आई थी तब उसने फसल की लागत का डेढ़ गुना एमएसपी तय करने के नए फार्मूले अपनाने की पहल की थी. कृषि सुधारों के लिए 2004 में स्वामीनाथन आयोग बना था. आयोग ने एमएसपी तय करने के कई फार्मूले सुझाए थे. डा. एमएस स्‍वामीनाथन समिति ने यह सिफारिश की थी कि एमएसपी औसत उत्‍पादन लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक होना चाहिए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश को लागू किया औ 2018-19 के बजट में उत्‍पादन लागत के कम-से-कम डेढ़ गुना एमएसपी करने की घोषणा की.
भारत में कृषि से जुड़े तीन कानूनों को लेकर राजनीतिक बवाल मचा हुआ है. विपक्षी पार्टियां विशेषकर पंजाब और हरियाणा में कई किसान संगठन इनका विरोध कर रहे हैं. सरकार कृषि से जुड़ी तमाम परेशानियों को दूर करने के उद्देश्य से ये कानून लाई है. केंद्र का कहना है कि ये कानून किसानों का काम आसान करेंगे. किसानों को मंडियों के बाहर अपनी फसल बेचने की आज़ादी होगी. किसान प्राइवेट कॉन्ट्रैक्ट के ज़रिए पहले ही अपनी फसल बेच सकेंगे.

वहीं दूसरी ओर किसानों को ये भी डर है कि इन कानून मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) को खत्म करने का रास्ता खुल जाएगा और किसान बड़ी प्राइवेट कंपनियों के रहमो-करम पर आश्रित हो जाएंगे. विरोधी किसानों का कहना है कि भारत सरकार इन कानूनों के ज़रिए कॉर्पोरेट्स को लाभ पहुंचाने की कोशिश कर रही है. हालाँकि मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) को कानूनी गारंटी कृषि संशोधन कानून 2020 के पहले भी कभी नहीं रहा है.

मेरा मानना है कृषि कानून में संशोधन ऐतिहासिक कदम है. जो बहुत पहले हो जाना चाहिए था. देर ही से सही, इससे किसान और उपभोक्ताओं दोनों का लाभप्रद होगा. मार्केटिंग लागत और बिचौलियों की लागत कम होगी, प्रतियोगिता बढ़ेगी और कृषि क्षेत्र में फायदा होगा.

इस कानून में कहीं नहीं उल्लेख किया गया है और न सरकार ने ऐसा कुछ कहा है. कि मंडी सिस्टम और एमएसपी खत्म हो जाएगी. 2019 में कांग्रेस ने खुद इस तरह के बदलावों की घोषणा की थी.

एपीएमसी मंडी सरकारी ज़मीन पर होती हैं. सरकार एक कृषि आधारित मार्केटिंग कमेटी बनाती है. वहां लाइसेंस ट्रेडिंग कमीशन एजेंट्स के ज़रिए हो सकती है. इन मंडियों में किसान खुद नहीं कमीशन एजेंट के माध्यम से फसल बेच सकता है. कमीशन एजेट 2.5 फीसदी तक कमीशन ले लेता है. अन्य खर्चे मिलाकर 8.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त कीमत बाद में बढ़ जाती है.एमएसपी का सिस्टम 1965 में शुरू हुआ. उस वक्त देश में अन्न की बहुत कमी थी. आज वो स्थिति नहीं है. एनएसएसओ का सर्वे कहता है कि केवल 6 प्रतिशत किसानों को इसका लाभ हुआ है. बाकी किसान कहां पर फसल बेचते हैं इसका किसी को पता नहीं. एक असंगठित क्षेत्र में भी किसान फसल बेचते हैं वो एमएसपी पर नहीं. एमएसपी सिर्फ चार से पांच स्टेट में किसानों को मिल पाता है.

वाजपेयी सरकार ने रिफॉर्म्स की बात कही थी. उसके बाद कांग्रेस ने भी इस तरह के बदलाव की बात कही थी. हालांकि ये बदलाव पूरे देश में शामिल नहीं हो पाए. कांग्रेस चाहती तो इसका फायदा ले सकती थी. ये कहकर कि मोदी सरकार हमारे घोषणा पत्र को लागू कर रही है, लेकिन कांग्रेस खुद इसका विरोध कर रही है.

कुछ राजनेताओं और दलों द्वारा यह आरोप लगाया जा रहा है की एक बार जब मंडी सिस्टम खत्म हो जाएगा तो क्या मल्टीनेशनल कंपनियां फसलों की कीमत में बड़ा बदलाव कर सकती हैं.

निष्कर्ष: नया कृषि संशोधन कानून से देश की खेती में प्रतियोगिता बढ़ेगी, नई तकनीक आएगी, बीज और खाद कंपनियां किसानों से करार करेंगी. बेहतर कीमतों के साथ ही गुणवत्ता में भी सुधार होगा. फूड सेफ्टी में भी सुधार होगा.

हालाँकि इसे पूर्ण आदर्श व्यवस्था नहीं मन जा सकता है. इसमें भी कुछ कमियां हैं जिनमें सुधार किया जा सकता है. दिशा ठीक है, बदलते परिवेश में लम्बे समय से कृषि क्षेत्र नियम कानून परिवर्तन की आवश्यकता महसूस किया जा रहा था इस दिशा में किया गया संशोधन प्रसंशनीय एवं स्वागतयोग्य है.

 

 

About Author : Ashok Kumar Choudhary is a retired banker who has wide experience in handling rural and agriculture credit . He is also a Trade Unionist and has held leadership position in Bharatitya Mazdoor Sangh, trade wing of RSS.

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