निःशब्द समय
हरियाली वही, मौसम वही, आसमां वही, दरिया भी वही । इस बार भी सावन आया , पर न हरी चूडियां खनकी, न झूले पड़े ,न कजरी सुनी, न पपिहा बोला, न पिया आया । विरहणी तो बहुत विरही, पर विरह गीत न सुना । सभी नि:शब्द, डरे-सहमे, घरों में दुबके बैठे हैं । करौना का…








